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शनिवार, 24 जुलाई 2010

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'

चित्रगुप्त महिमा - आचार्य संजीव 'सलिल'



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चित्र-चित्र में गुप्त जो, उसको विनत प्रणाम।
वह कण-कण में रम रहा, तृण-तृण उसका धाम ।

विधि-हरि-हर उसने रचे, देकर शक्ति अनंत।
वह अनादि-ओंकार है, ध्याते उसको संत।

कल-कल,छन-छन में वही, बसता अनहद नाद।
कोई न उसके पूर्व है, कोई न उसके बाद।

वही रमा गुंजार में, वही थाप, वह नाद।
निराकार साकार वह, नेह नर्मदा नाद।

'सलिल' साधना का वही, सिर्फ़ सहारा एक।
उस पर ही करता कृपा, काम करे जो नेक।

जो काया को मानते, परमब्रम्ह का अंश।
'सलिल' वही कायस्थ हैं, ब्रम्ह-अंश-अवतंश।

निराकार परब्रम्ह का, कोई नहीं है चित्र।
चित्र गुप्त पर मूर्ति हम, गढ़ते रीति विचित्र।

निराकार ने ही सृजे, हैं सारे आकार।
सभी मूर्तियाँ उसी की, भेद करे संसार।

'कायथ' सच को जानता, सब को पूजे नित्य।
भली-भाँति उसको विदित, है असत्य भी सत्य।

अक्षर को नित पूजता, रखे कलम भी साथ।
लड़ता है अज्ञान से, झुका ज्ञान को माथ।

जाति वर्ण भाषा जगह, धंधा लिंग विचार।
भेद-भाव तज सभी हैं, कायथ को स्वीकार।

भोजन में जल के सदृश, 'कायथ' रहता लुप्त।
सुप्त न होता किन्तु वह, चित्र रखे निज गुप्त।

चित्र गुप्त रखना 'सलिल', मन्त्र न जाना भूल।
नित अक्षर-आराधना, है कायथ का मूल।

मोह-द्वेष से दूर रह, काम करे निष्काम।
चित्र गुप्त को समर्पित, काम स्वयं बेनाम।

सकल सृष्टि कायस्थ है, सत्य न जाना भूल।
परमब्रम्ह ही हैं 'सलिल', सकल सृष्टि के मूल।

अंतर में अंतर न हो, सबसे हो एकात्म।
जो जीवन को जी सके, वह 'कायथ' विश्वात्म।
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गुरुवार, 13 मई 2010

मुक्तिका: कुछ हवा दो.... --संजीव 'सलिल'


मुक्तिका:

संजीव 'सलिल'

कुछ हवा दो अधजली चिंगारियाँ फिर बुझ न जाएँ.
शोले जो दहके वतन के वास्ते फिर बुझ न जाएँ..

खुद परस्ती की सियासत बहुत कर ली, रोक दो.
लहकी हैं चिंगारियाँ फूँको कि वे फिर बुझ न जाएँ..

प्यार की, मनुहार की, इकरार की, अभिसार की 
मशालें ले फूँक दो दहशत, कहीं फिर बुझ न जाएँ..

ज़हर से उतरे ज़हर, काँटे से काँटा दो निकाल.
लपट से ऊँची लपट करना 'सलिल' फिर बुझ न जाएँ...

सब्र की हद हो गयी है, ज़ब्र की भी हद 'सलिल'
 चिताएँ उनकी जलाओ इस तरह फिर बुझ न जाएँ..
***
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

मुक्तक / चौपदे ------------'सलिल'

मुक्तक / चौपदे

 
विश्व को दीपक मिला तो, चाँदनी की चाह की.
चाँदनी ने पर कहाँ कब किसी की परवाह की..
पूर्णिमा में चाँद के सँग की 'सलिल' अठखेलियाँ-
अमावस में चाँद बेचारे ने बेबस आह की..

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है. 
 
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 ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll
 ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll
 ll   नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll
 ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll
                              ****************
 
दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया.
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया.
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया.
 
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कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा.
जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा?
बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा-
पत्थरों पर 'सलिल' गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा.
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कौन किसी का है दुनिया में. आना-जाना खाली हाथ.
इस दरवाजे पर मय्यत है उस दरवाजे पर बारात.
सुख-दुःख धूप-छाँव दोनों में साज और सुर मौन न हो-
दिल से दिल तक जो जा पाये 'सलिल' वही सच्चे नगमात.
 
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हमने ख़ुद से करी अदावत, दुनिया से सच बोल दिया.
दोस्त बन गए दुश्मन पल में, अमृत में विष घोल दिया.
संत फकीर पादरी नेता, थे नाराज तो फ़िक्र न थी-
'सलिल' अवाम आम ने क्यों काँटों से हमको तोल दिया?
  
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मुंबई पर दावा करते थे, बम फूटे तो कहाँ गए?
उसी मांद में छुपे रहो तुम, मुंह काला कर जहाँ गए.
दिल पर राज न कर पाए, हम देश न तुमको सौंपेंगे-
नफरत  फैलानेवालों  को  हम  पैरों  से  रौंदेंगे.
 
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मुक्तक : दोस्त
 
दोस्त हैं पर दोस्ती से दूर हैं.
क्या कहें वे आँखें रहते सूर हैं.
'सलिल' दुनिया के लिए वे बोझ हैं-
किंतु अपनी ही नजर में नूर हैं.
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दोस्त हो तो दिल से दिल मिलने भी दो.
निकटता के फूल कुछ खिलने भी दो.
सफलता में साथ होते सब 'सलिल'-
राह में संग एडियाँ छिलने भी दो.
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दोस्त से ही शिकवा-शिकायत क्यों है?
दोस्त को ही हमसे अदावत क्यों है?
थाम लो हाथ तो ये दिल भी मिल ही जायेंगे-
तब ही पूछेंगे 'सलिल' हममें सखावत क्यों है?
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उफ़ ये नाज़ुक सा कलेजा, और चेहरा माहताब.
दोस्त बनकर जलाते हो जैसे निकला आफ़ताब.
आह भी भरते हैं हम तो वाह वो कहने लगे-
उनके आगे 'सलिल' जाने क्यों हुआ है लाजवाब?
 
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वादा करके भूल गए जो अपने प्यारे दोस्त वही.
समय व्यर्थ ही गवां रहे जो अपने प्यारे दोस्त वही.
'सलिल' पीठ में छुरा भोंकना और पूछना दिल का हाल-
अपनी फितरत बता रहे जो अपने प्यारे दोस्त वही.
 
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पुस्तकें मिलने-मिलाने का बहाना हो गयीं.
आए कासिद या न आए वो फसाना हो गयीं.
दूरदर्शन या कि अंतरजाल में दूरी 'सलिल'-
जो चली पुस्तक लिए वो ख़ुद निशाना हो गयी.
 
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हुस्न-ओ-इश्क की बातें न करो ऐ जानम!.
ताज में अब न मोहब्बत के फूल खिलते हैं.
बोलते बम रहे शिव जी के भक्त आज तलक-
ताज में आजकल शव और बम ही मिलते हैं.
 
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बहाते हैं जो लहू रोज़ बेकसूरों का.
लहू उनका भी रोज नालियों में बहता है.
जो टूटता है उसे फ़िर बना लेता है 'सलिल'-
जालिमों का कभी नामो-निशान न रहता है.
 
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मैं ही नहीं, तू भी तो मेरा तलबगार है.
तू जिसका प्यार है, वही तेरा भी प्यार है.
गर सच नहीं तो जिंदगी की धार मोड़ दे-
तुझको न चाहे जो उसे तू हँस के छोड़ दे.
 
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न आँसू बहाओ, न नज़रें झुकाओ.
गमे-इश्क को हँस के दिल से लगाओ.
जो चाहा न पाया, 'सलिल' इसका गम क्यों?
जो पाया है उसकी खुशी तो मनाओ.
 
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जलाओ शमा, रात सारी जगो तुम.
सितारों से आगे हमेशा रहो तुम.
खुदा की है नेमत 'सलिल' साँस तेरी-
मोहब्बत हमेशा उसी से करो तुम.
 
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जो बेकस हैं, उनको गले से लगाओ.
हैं नादां जो, उनको भी दाना बनाओ.
न जीने का मकसद बतायेगा कोई-
'सलिल' ख़ुद ही औरों के तुम काम आओ.
 
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जिसकी बाँहों में रहे तू, जो तेरी बाँहों में हो.
यह जरूरी तो नहीं है वो तेरी चाहों में हो.
मंजिलें हों कहीं भी, हरगिज न छोडेंगे 'सलिल'-
यह जरूरी तो नहीं मंजिल तेरी राहों में हो.
 
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न सूरज या चंदा मुझे तुम बनाते.
सितारों सा मंदा मुझे क्यों बताते.
दुआ दे रहे तो भी कंजूसी करके-
'सलिल' यार सच्चे ही ऐसे सताते.
 
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ख्वाब में आती रहो तुम सच में मत आना.
वस्ल के सपने दिखा गाती रहो गाना.
दाल-रोटी कमाने में प्यार होगा गुम-
'सलिल' रहकर दूर ही तुम मन मेरे भाना
 
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लम्हा-लम्हा याद तुम्हारी, गम को दूर हटाती है.
खुशबू अगरबत्तियों की ज्यों, सांसों को महकाती है.
जग ने चाहा भूलूँ तुमको, बरबस याद आ रही हो-
'सलिल' थपकियाँ दे बच्चे को माँ ही गोद खिलाती है.
 
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पास रहीं तो तनिक न सोचा, कभी दूर हो जाओगी.
दूर गयीं तो क्या मालूम था और निकट हो जाओगी.
माँ तुम बिन मैं हुआ अधूरा, दुनिया लगती बेमानी.
बस इतना ही मुझे बता दो कैसे-कब मिल पाओगी?
 
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पहले बेहद मन भाती थी लेकिन अब चुभती है धूप.
हुस्न-इश्क रुचते थे पहले लेकिन अब न सुहाता रूप.
याद तुम्हारी बतलाती है, मैं अब निपट अकेला हूँ-
रंक हुआ है 'सलिल' बिचारा, माँ के आँचल में था भूप.
 
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मुझे तुझसे मिलने की सजा, जब जो मिलेगी कुबूल है.
तेरी रहगुजर का शूल हर मुझे लग रहा है कि फूल है,
तन दो हमारे भले ही हों पर मन 'सलिल'  हैं एक ही-
जुदा हमको करना जो चाहते, नहीं जानते कि भूल है.
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अपने सपने पूरे होंगे साथ मेरा तुम दो न दो
या सुख-दुःख में साथ रहो या दरवाजे से रुखसत हो.
कोशिश के शैदाई हैं हम नहीं नतीजों की चिंता-
ऊपरवाले! आख़िर दम तक नहीं 'सलिल' को फुर्सत हो.

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बेवफाई का गिला तज, ख़ुद वफ़ा पहले करो.
फ़िक्र नुकसानों की छोडो, कुछ नफा पहले करो.
'सलिल' कोशिश पर भरोसा करो मत पीछे हटो-
शक-शुबह, शिकवे-शिकायत को दफा पहले करो.
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इंसां है तो डूब रहा क्यों? अपनी मन-मर्जी से तैर.
नहीं किसी से व्यर्थ दोस्ती, नहीं किसी से नाहक बैर.
भाग्य विधाता है तू अपना, हाथों से लिख दे तकदीर-
तेरे दुश्मन तुझसे माँगें अपनी-अपनी जां की खैर. 
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नदी वही जो प्यास बुझाये, बिना मोल देकर पानी.
वतन वही जो गले लगाये,  माफ़ कर सके नादानी.
पंछी वह जो ख़ुद भूखा रह भरता है चूजों का पेट-
'सलिल' सिर्फ़ इंसान बना रह, हर इंसां है लासानी.
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अंधेरों का-उजालों का मेल होती जिंदगी.
खुशी-गम का सिलसिला है खेल होती जिंदगी.
कभी रुकती ही नहीं है. यह निरंतर चल रही-
'सलिल' हे पल नयेपन का मेल होती जिंदगी.
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तू अपनी तकदीर बदल दे, मौसम की कुछ फ़िक्र न कर.
जो जाकर फ़िर लौट न आयें, ऐसों को तू मित्र न कर.
साथ छोड़ दे अँधियारे में जो वह साया होता है-
'सलिल' साथ कर इंसानों का, परछाईं की फ़िक्र न कर.
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खन-खन, छम-छम तेरी आहट, हर पल चुप रह सुनता हूँ.
आँख मूँदकर, अनजाने ही तेरे सपने बुनता हूँ.
छिपी कहाँ है मंजिल मेरी, आकर झलक दिखा दे तू-
'सलिल' नशेमन तेरा, तेरी खातिर तिनके चुनता हूँ.
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बादलों की ओट में महताब लगता इस तरह
छिपी हो घूँघट में ज्यों संकुचाई शर्मीली दुल्हन.
पवन सैयां आ उठाये हौले-हौले आवरण-
'सलिल' में प्रतिबिम्ब देखे, निष्पलक होकर मगन.
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भर रंग-गुलाल, उठा लियो थाल, चले बृज ग्वाल, सुनावत फागें.
आकुल व्याकुल श्याम 'सलिल' संग, दाऊ-कन्हैया को कर आगे.
गुपियन लै पिचकारी चलावें, रोके रुकें नहीं, धूम मचावैं.
युग्म लखें विधि-हरि-हर औचक, नारद नाचें, वीणा सुनावें.
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जो दूर रहते हैं वही तो पास होते हैं.
जो हँस रहे, सचमुच वही उदास होते हैं.
सब कुछ मिला 'सलिल' जिन्हें अतृप्त हैं वहीं-
जो प्यास को लें जीत वे मधुमास होते हैं.
पग चल रहे जो वे सफल प्रयास होते हैं
न थके रुक-झुककर वही हुलास होते हैं.
चीरते जो सघन तिमिर को सतत 'सलिल'-
वे दीप ही आशाओं की उजास होते है.
जो डिगें न तिल भर वही विश्वास होते हैं.
जो साथ न छोडें वही तो खास होते हैं.
जो जानते सीमा, 'सलिल' कह रहा है सच देव!
वे साधना-साफल्य का इतिहास होते हैं  

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भावनाओं औ' कामनाओं का जब-जब हाथ मिला.
तब-तब ही मन के उपवन में कविता-सुमन खिला.
दिग्-दिगंत को किया सुवासित, चहक रहे मन-प्राण.
'सलिल' महक ने आस-प्यास को पल में दिया मिला.
.                        ***********

स्वाधीनता दिवस पर-
मुक्तक
आचार्य संजीव 'सलिल'
भारत माता मुक्तिदायिनी गोदी में भगवान खिलाती.
लोरी सुना राम-कान्हा को, प्रेमपूर्वक शयन कराती.
अगणित संतानें सब जग में 'वन्दे मातरम' बोल रही हैं-
स्वर्ग से सुन्दर बाँकी-झाँकी, अँखियाँ देख धन्य हो जातीं..
*********
देश इष्ट ईमान धर्म रब देव खुदा ईश्वर है अपना.
पथ पग पथिक लक्ष्य साधन शुचि, साध्य-साधना, सच औ' सपना.
श्वास-आस-परिहास, हर्ष-दुःख, मिलन-विरह वात्सल्य-भक्ति भी.
देश-प्रेम को नाप सके जो 'सलिल' न जग में अब तक नपना.
***********
लेश न संशय शेष, देश हित जीना ही अपनी परिपाटी.
नेत्रहीन होकर भी शर-धनु ले दुश्मन की गर्दन काटी.
सवा लाख से एक लड़े पर हार न हमने रण में मानी-
सबल-प्रबल अरिदल ने बारंबार समर में धूलि चाटी.
***********
जब हम आपस में टकराए, तभी शत्रु ने लाभ उठाया.
बार-बार जीता-छोडा पर उसने मौका नहीं गँवाया.
आँख फोड़कर क़ैद किया, भारत माता को रौंदा-लूटा.
जब-जब एक हुए अरि हारा, पद तल मस्तक विवश झुकाया..
*************
नीति धर्म सत् शील न त्यागा, प्राण  दिए पर तजा नहीं रण.
घास-तृणों की रोटी खायी, किंतु निभाया था अपना प्रण.
सिरहाने पर सांप सदृश भय अरि को होता देख स्वप्न में-
देख प्रताप शक्ति थर्राता था दिल्लीश्वर अकबर प्रति क्षण.
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निज गृह के अंतर्विरोध मिल-बैठ हमें सुलझाने होंगे.
जन-हितकारी नियम-कायदे बना काम में लाने होंगे.
काँटे-कंकर बीन बाग़ से, श्रम-सीकर से करें सिंचाई-
कैक्टस हटा नीम-तुलसी के बिरवे हमें लगाने होंगे..
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मातृभूमि की रज-चन्दन का, मस्तक तिलक लगाना होगा.
मातृभूमि की चरण-वन्दना कर जन-गण-मन गाना होगा.
मजहब, पन्थ, रिलीजन कुछ हो, राष्ट्र-धर्म अपनाना होगा-
राष्ट्र हेतु निज प्राण दाँव पर लगा शीश कटवाना होगा..
rachnakar
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स्वाधीनता दिवस पर-
मुक्तक
आचार्य संजीव 'सलिल'
राष्ट्र जमीं का महज न टुकडा, यह आस्था-विश्वास हमारा.
तीर्थ, धर्म, मंदिर, मस्जिद, मठ, गिरजा, देवालय, गुरुद्वारा.
भाषा-भूषा-भेष भिन्न हैं, लेकिन ह्रदय भिन्न मत मानो-
कोटि-कोटि हम मात्र एक हैं, 'जय भारत माँ' सबका नारा.
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सत्ता और सियासत केवल साधन, साध्य न इनको मानो.
जनहित-राष्ट्रोत्थान एक ही लक्ष्य अटल अपना पहचानो. .
संसद और विधानसभा में वाग्वीर जो पहुँच गए हैं-
ठुकरा उनको, जन-सेवक चुन, जनगण की जय निश्चय जानो..
**********
देव, खुदा, रब, गौड, ईश्वर,  गुरु, ऋषि भारत की संतान.
भारत जग में सबसे ज्यादा पावन, सबसे अधिक महान.
मंत्र, ऋचाएँ, श्लोक, आरती, आयत, प्रेयर औ' अरदास.
वन्दन-अर्चन करें राष्ट्र का, 'सलिल' सतत का र्गौरव गान.
*********
संसद मंदिर लोकतंत्र का, हुल्लड़ जनगण का उपहास.
चला गोलियां मानव-द्रोही फैलाते नृशंस संत्रास.
मूक रहे गर इन्हें न रोका, तो अपराधी हम होंगे-
'सलिल' सत्य यह, क्षमा न हमको देगा किंचित भी इतिहास.
***********
'बाजी लगा जान की, रोको आतंकी-हत्यारों को.
असफल हुआ सुरक्षा बल, क्यों मारा ना गद्दारों को?'
कहते जो नेता, सेना में निज बेटे पहले भेजें-
देश बचाते जान गँवाकर, नमन सिपहसालारों को..
anubhooti
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ज़िंदगी में इतनी भी जगमगाहट न हो
अँधेरा जब आये तो आहट न हो.
अँधेरे उजालों में तब्दील हों-
केवल उजालों की चाहत न हो..
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हरेक दिल की बयानी है.
सुबह लगती सुहानी है.
साँझ होती हसीं-दिलकश-
निशा पुरनम कहानी है..
*******************
समय बदला तो समय के साथ ही प्रतिमान बदले.
प्रीत तो बदली नहीं पर प्रीत के अनुगान बदले.
हैं वही अरमान मन में, है वही मुस्कान लब पर-
वही सुर हैं वही सरगम 'सलिल' लेकिन गान बदले..

रूप हो तुम रंग हो तुम सच कहूँ रस धार हो तुम.
आरसी तुम हो नियति की प्रकृति का श्रृंगार हो तुम..
भूल जाऊँ क्यों न खुद को जब तेरा दीदार पाऊँ-
'सलिल' लहरों में समाहित प्रिये कलकल-धार हो तुम..

नारी ही नारी को रोके इस दुनिया में आने से.
क्या होगा कानून बनाकर खुद को ही भरमाने से?.
दिल-दिमाग बदल सकें गर, मान्यताएँ भी हम बदलें-
'सलिल' ज़िंदगी तभी हँसेगी, क्या होगा पछताने से?
*
ममता को समता के पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
*
मौन वह कहता जिसे आवाज कह पाती नहीं.
क्या क्षितिज से उषा-संध्या मौन हो गाती नहीं.
शोरगुल से शीघ्र ही मन ऊब जाता है 'सलिल'-
निशा जो स्तब्ध हो तो क्या तुम्हें भाती नहीं?
*
इन्तिज़ार को मिला है इन्तिज़ार ही.
मेहनत का सिला मिला है कुछ-कुछ उधार भी.
फूलों की थी तलाश भले शूल ही मिले-
कुछ बिन किये 'सलिल' क्यों आशा बहार की?

खतरा बड़ा या खतरी इसे कौन बताये.
सब शोक हर अशोक से किस्मत ही मिलाये.
हर जीव जो संकेत समझ ले वही संजीव-
जो 'सलिल' वो मुट्ठी में कहो किस तरह आये?

दिल लगाकर दिल्लगी हमने न की.
दिल जलाकर बंदगी तुमने न की..
दिल दिया ना दिला लिया, बस बात की-
दिल दुखाया सबने हमने उफ़ न की..

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

सूचना : चित्रांश संजीव 'सलिल' बिलासपुर में

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चित्रांश संजीव वर्मा 'सलिल' ११-से १४ अप्रैल तक बिलासपुर छतीसगढ़ में हैं. वे सामाजिक एकता, चिट्ठाकारी  के विकास तथा साहित्यिक आयोजनों में सहभागिता करेंगे. इच्छुक जन निम्न पाते पर संपर्क करें: द्वारा: प्रो. सत्य सहाय, ७३ गायत्री मर्ग, विद्या नगर, बिलासपुर चलभाष: ०९४२५१८३२४४.

लिमटी खरे को 'संवाद सम्मान '

लिमटी खरे को 'संवाद सम्मान '
(शुक्रवार /09 अप्रैल 2010 / नई दिल्ली / मीडिया मंच )
 

चिट्ठाकारी सामाजिक चेतना को नए आयाम देने का कार्य अहर्निश कर रही है. सामाजिक चेतना के इस नए संसाधन का प्रभावी और लोकप्रिय उपयोग करना सबके बस का रोग नहीं है. इस दुकर कार्य को सहजता से करनेवालों में  पहना नाम है श्री लिमटी खरे का । खरे जी  की सक्रियता चिट्ठा  जगत में किसी से छिपी नहीं है। वे सामाजिक विषयों पर अपने धुंआधार लेखन के लिए जाने जाते हैं। पेशे से लिमटी जी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और अपने ब्लॉग 'रोजनामचा ' में दुनिया भर की खबरे लिया और दिया करते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ वे 'नुक्कड़ ',  'आमजन की खबरें ' और 'पहाड़ी की धूम ' आदि ब्लॉगों पर भी अपना सक्रिय योगदान करते रहते हैं। वे कायस्थ सभा के सक्रिय कार्यकर्ता भी रहे हैं । सम्वाद सम्मान मिलने पर हम सबकी ओर से उनका हार्दिक अभिनन्दन ।

शनिवार, 6 मार्च 2010

नर्मदा नामावली: --आचार्य संजीव 'सलिल'

नर्मदा नामावली

आचार्य संजीव 'सलिल'

पुण्यतोया सदानीरा नर्मदा.
शैलजा गिरिजा अनिंद्या वर्मदा.
शैलपुत्री सोमतनया निर्मला.
अमरकंटी शांकरी शुभ शर्मदा.
आदिकन्या चिरकुमारी पावनी.
जलधिगामिनी चित्रकूटा पद्मजा.
विमलहृदया क्षमादात्री कौतुकी.
कमलनयनी जगज्जननि हर्म्यदा.
शाशिसुता रौद्रा विनोदिनी नीरजा.
मक्रवाहिनी ह्लादिनी सौंदर्यदा.
शारदा वरदा सुफलदा अन्नदा.
नेत्रवर्धिनि पापहारिणी धर्मदा.
सिन्धु सीता गौतमी सोमात्मजा.
रूपदा सौदामिनी सुख-सौख्यदा.
शिखरिणी नेत्रा तरंगिणी मेखला.
नीलवासिनी दिव्यरूपा कर्मदा.
बालुकावाहिनी दशार्णा रंजना.
विपाशा मन्दाकिनी चित्रोंत्पला.
रुद्रदेहा अनुसूया पय-अंबुजा.
सप्तगंगा समीरा जय-विजयदा.
अमृता कलकल निनादिनी निर्भरा.
शाम्भवी सोमोद्भवा स्वेदोद्भवा.
चन्दना शिव-आत्मजा सागर-प्रिया.
वायुवाहिनी कामिनी आनंददा.
मुरदला मुरला त्रिकूटा अंजना.
नंदना नाम्माडिअस भव मुक्तिदा.
शैलकन्या शैलजायी सुरूपा.
विपथगा विदशा सुकन्या भूषिता.
गतिमयी क्षिप्रा शिवा मेकलसुता.
मतिमयी मन्मथजयी लावण्यदा.
रतिमयी उन्मादिनी वैराग्यदा.
यतिमयी भवत्यागिनी शिववीर्यदा.
दिव्यरूपा तारिणी भयहांरिणी.
महार्णवा कमला निशंका मोक्षदा.
अम्ब रेवा करभ कालिंदी शुभा.
कृपा तमसा शिवज सुरसा मर्मदा.
तारिणी वरदायिनी नीलोत्पला.
क्षमा यमुना मेकला यश-कीर्तिदा.
साधना संजीवनी सुख-शांतिदा.
सलिल-इष्ट माँ भवानी नरमदा.

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गुरुवार, 4 मार्च 2010

मुक्तक / चौपदे: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

मुक्तक / चौपदे

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन
सलिल.संजीव@जीमेल.com

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है.

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ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll
ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll
ll नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll
ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll
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दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया.
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया.
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया.

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कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा.
जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा?
बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा-
पत्थरों पर 'सलिल' गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा.
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कौन किसी का है दुनिया में. आना-जाना खाली हाथ.
इस दरवाजे पर मय्यत है उस दरवाजे पर बारात.
सुख-दुःख धूप-छाँव दोनों में साज और सुर मौन न हो-
दिल से दिल तक जो जा पाये 'सलिल' वही सच्चे नगमात.
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शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

'गोत्र' तथा 'अल्ल'


'गोत्र' तथा 'अल्ल'

'गोत्र' तथा 'अल्ल' के अर्थ तथा महत्व संबंधी प्रश्न राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष होने के नाते मुझसे भी पूछे जाते हैं.

स्कन्दपुराण में वर्णित श्री चित्रगुप्त प्रसंग के अनुसार उनके बारह पुत्रों को बारह ऋषियों के पास विविध विषयों की शिक्षा हेतु भेजा गया था. इन से ही कायस्थों की बारह उपजातियों का श्री गणेश हुआ. ऋषियों के नाम ही उनके शिष्यों के गोत्र हुए. इसी कारण विभिन्न जातियों में एक ही गोत्र मिलता है चूंकि ऋषि के पास विविध जाति के शिष्य अध्ययन करते थे. आज कल जिस तरह मॉडल स्कूल में पढ़े विद्यार्थी 'मोडेलियन' रोबेर्त्सों कोलेज में पढ़े विद्यार्थी 'रोबर्टसोनियन' आदि कहलाते हैं, वैसे ही ऋषियों के शिष्यों के गोत्र गुरु के नाम पर हुए. आश्रमों में शुचिता बनाये रखने के लिए सभी शिष्य आपस में गुरु भाई तथा गुरु बहिनें मानी जाती थीं. शिष्य गुरु के आत्मज (संततिवत) मान्य थे. अतः, उनमें आपस में विवाह वर्जित होना उचित ही था. 

एक 'गोत्र' के अंतर्गत कई 'अल्ल' होती हैं. 'अल्ल' कूट शब्द (कोड) या पहचान चिन्ह है जो कुल के किसी प्रतापी पुरुष, मूल स्थान, आजीविका, विशेष योग्यता, मानद उपाधि या अन्य से सम्बंधित होता है. एक 'अल्ल' में विवाह सम्बन्ध सामान्यतया वर्जित मन जाता है किन्तु आजकल अधिकांश लोग अपने 'अल्ल' की जानकारी नहीं रखते. हमारा गोत्र 'कश्यप' है जो अधिकांश कायस्थों का है तथा उनमें आपस में विवाह सम्बन्ध होते हैं. हमारी अगर'' 'उमरे' है. मुझे इस अल्ल का अब तक केवल एक अन्य व्यक्ति मिला है. मेरे फूफा जी की अल्ल 'बैरकपुर के भले' है. उनके पूर्वज बैरकपुर से नागपुर जा बसे.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

एक चर्चा चैट पर: डॉ. नील कमल सक्सेना-संजीव वर्मा 'सलिल'

एक चर्चा चैट पर:


चर्चाकार: डॉ. नील कमल सक्सेना-संजीव वर्मा 'सलिल'


Dr: : vermaji namaskar

मैं: jaichitrgupt ji ki.

Dr: AAP JABALPUR ME KYA KAM KARTE HAI

मैं: SDO PWD

Dr: aap ke profile se lagta he aap ek good poet and imotional person है

मैं: aap sahee hain.

Dr: i am vet dr in raj govt

मैं: aapse parichit hokar prasannata huee.

Dr: i am very thankful u to make me ur friend

मैं: chitt-chitt men gupt hain, chitrgupt bhagvan.
sakal srishti kayasth hai, jad-chetan asntan

Dr: mujhe kisi bhi kayastha person se bat kerna acha lagta hai

Dr: mere pas aap jitna gyan dhyan to hai nahi, phir bhi apne chitrgupt bansaj hone per proud hai

मैं: दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो कायस्थ नहीं हो. 'काया स्थितः सह कायस्थः' जिसकी काया में 'वह' (परमपिता परम्ब्रम्ह) स्थित हो वह कायस्थ है.. '

Dr: how we can sepret us from them

मैं: हम अन्यों से भिन्न नहीं हैं, वे हमारे समान हैं यही तो हमारी विशेषता है. हर नदी एक-दूसरे से अलग होती है. सागर सबसे मिलके बनता है पर किसी के जैसा नहीं होता वह सबसे भिन्न होता है पर सभी नदियाँ सागर से अलग होकर भी सागर का ही प्रतिरूप होती हैं.

Dr: pata nahi kyon me aap se sahamat nahi

मैं: जिस तरह कमल जल में होकर भी जल से बाहर होता है उसी तरह कायस्थ भी सबसे जुदा होकर भी
सबके साथ होता है.
डॉ; मैं आपसे सहमत नहीं.
मैं: बचपन से जो सुनते-देखते आये हैं उससे मुक्त हो पाना सहज नहीं होता. मुझे सत्य की प्रतीति होने में ३० वर्ष लगे.

मैं: ऐसा न होता तो चित्रगुप्त जी के ऐसे दो विवाहों की कल्पना क्यों होती जो अंतरजातीय, अन्तरभाषीय, अंतरदेशीय हैं.
Dr: go more detaile

मैं: 'कायथ घर भोजन करे बचे न एकहु जात.' का आशय यही तो है कि कायस्थ सबका मूल है.

मैं: कायस्थ वट वृक्ष है जिसकी शाखाएं और पत्तियां अन्य सभी हैं.

Dr: aap ye to nahi kahna chah rahe ki KAYA ME AATMA KAYASTH
11:31 PM बजे गुरुवार को प्रेषित
मैं: आप सत्य के निकट आ रहे हैं. परमात्मा निराकार ( आकार रहित अर्थात जिसका चित्र गुप्त है) है. उसका कोई अंश जब किसी काया में स्थित होता है तो कायस्थ होता है, यह अंश निकलते ही काया मिट्टी (निर्जीव) हो जाती है.

Dr: ye baat kitne log maante hai

मैं: मनु ने रूपक में कहा है कि ब्रम्हा के मुँह से ब्रम्हां, उदर से वैश्य, बाहू से क्षत्रिय और पैर से शूद्र उत्पन्न हुए. कायस्थ कहाँ से आये? कायस्थ अंश नहीं समग्र हैं. कहा गया है कि वे ब्रम्हा की समूची काया से आये. फिर वे सबसे श्रेष्ठ और सबके मूल हुए या नहीं?
सत्य को लोग न जानें या न मानें तो क्या सत्य बेमानी हो जायेगा?

Dr: phir do shaadi ki kalpna kyon .., bo bhi anterjaatya

Dr: anterdesiey to theek ,apne des में

मैं: परमब्रम्ह निर्विकार है, वह आदि पुरुष है. वह सृजन नहीं करता, सृजन हेतु परा-प्रकृति की सहभागिता जरूरी है. पृकृति ही पुरुष की शक्ति है. 'शिवा' के बिना 'शिव' केवल 'शव' रह जाते हैं. दो माताएं आधिदैविक तथा आधिभौतिक शक्तियों की प्रतीक हैं.
आपके मत की प्रतीक्षा है.


Dr: to pahle shiv aaye ya brahma


मैं: सृष्टि में कोटि-कोटि ब्रम्हांड हैं, इसे धर्म और विज्ञानं दोंनो मानते हैं. हर ब्रम्हांड का अलग-अलग ब्रम्हा-विष्णु-महेश हैं जो सृजन-पालन और विनाश करते हैं. चित्रगुप्त एकमात्र हैं जो सबके कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं.


मैं: shesh fir kabhee...ab neend aa rahee hai. shubh ratri...
Dr: ok good nt

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सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर विशेष गीत:



सारा का सारा हिंदी है

आचार्य संजीव 'सलिल'

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जो कुछ भी इस देश में है, सारा का सारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


मणिपुरी, कथकली, भरतनाट्यम, कुचपुडी, गरबा अपना है.

लेजिम, भंगड़ा, राई, डांडिया हर नूपुर का सपना है.

गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, चनाब, सोन, चम्बल,

ब्रम्हपुत्र, झेलम, रावी अठखेली करती हैं प्रति पल.

लहर-लहर जयगान गुंजाये, हिंद में है और हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा सबमें प्रभु एक समान.

प्यार लुटाओ जितना, उतना पाओ औरों से सम्मान.

स्नेह-सलिल में नित्य नहाकर, निर्माणों के दीप जलाकर.

बाधा, संकट, संघर्षों को गले लगाओ नित मुस्काकर.

पवन, वन्हि, जल, थल, नभ पावन, कण-कण तीरथ, हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


जै-जैवन्ती, भीमपलासी, मालकौंस, ठुमरी, गांधार.

गजल, गीत, कविता, छंदों से छलक रहा है प्यार अपार.

अरावली, सतपुडा, हिमालय, मैकल, विन्ध्य, उत्तुंग शिखर.

ठहरे-ठहरे गाँव हमारे, आपाधापी लिए शहर.

कुटी, महल, अँगना, चौबारा, हर घर-द्वारा हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


सरसों, मका, बाजरा, चाँवल, गेहूँ, अरहर, मूँग, चना.

झुका किसी का मस्तक नीचे, 'सलिल' किसी का शीश तना.

कीर्तन, प्रेयर, सबद, प्रार्थना, बाईबिल, गीता, ग्रंथ, कुरान.

गौतम, गाँधी, नानक, अकबर, महावीर, शिव, राम महान.

रास कृष्ण का, तांडव शिव का, लास्य-हास्य सब हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....


ट्राम्बे, भाखरा, भेल, भिलाई, हरिकोटा, पोकरण रतन.

आर्यभट्ट, एपल, रोहिणी के पीछे अगणित छिपे जतन.

शिवा, प्रताप, सुभाष, भगत, रैदास कबीरा, मीरा, सूर.

तुलसी. चिश्ती, नामदेव, रामानुज लाये खुदाई नूर.

रमण, रवींद्र, विनोबा, नेहरु, जयप्रकाश भी हिंदी है.

हर हिंदी भारत माँ के माथे की उज्जवल बिंदी है....

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com