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सोमवार, 12 अगस्त 2013

doha salila; bhavan mahatmya -acharya sanjiv verma 'salil'

दोहा सलिला :
भवन माहात्म्य
संजीव
*
[इंस्टिट्यूशन ऑफ़ इंजीनियर्स, लोकल सेंटर जबलपुर द्वारा गगनचुम्बी भवन (हाई राइज बिल्डिंग) पर १०-११ अगस्त २०१३ को आयोजित अखिल भारतीय संगोष्ठी  की स्मारिका में प्रकाशित कुछ दोहे।]

*
भवन मनुज की सभ्यता, ईश्वर का वरदान।
रहना चाहें भवन में, भू पर आ भगवान।१।
*
भवन बिना हो जिंदगी, आवारा-असहाय।
अपने सपने ज्यों 'सलिल', हों अनाथ-निरुपाय।२।
*
मन से मन जोड़े भवन, दो हों मिलकर एक।
सब सपने साकार हों, खुशियाँ मिलें अनेक।३।
*
भवन बचाते ज़िन्दगी, सड़क जोड़ती देश।
पुल बिछुडों को मिलाते, तरु दें वायु हमेश।४।
*
राष्ट्रीय संपत्ति पुल, सड़क इमारत वृक्ष।
बना करें रक्षा सदा, अभियंतागण दक्ष।५।
*
भवन सड़क पुल रच बना, आदम जब इंसान।
करें देव-दानव तभी, मानव का गुणगान।६।
*
कंकर को शंकर करें, अभियंता दिन-रात।
तभी तिमिर का अंत हो, उगे नवल प्रभात७।
*
भवन सड़क पुल से बने, देश सुखी संपन्न।
भवन सेतु पथ के बिना, होता देश विपन्न।८।
*
इमारतों की सुदृढ़ता, फूंके उनमें जान।
देश सुखी-संपन्न हो, बढ़े विश्व में शान।९।
*
भारत का नव तीर्थ है, हर सुदृढ़ निर्माण।
स्वेद परिश्रम फूँकता, निर्माणों में प्राण।१०।
*
अभियंता तकनीक से, करते नव निर्माण।
होता है जीवंत तब, बिना प्राण पाषाण।११।
*
भवन सड़क पुल ही रखें, राष्ट्र-प्रगति की नींव।
सेतु बना- तब पा सके, सीता करुणासींव।१२।
*
करे इमारत को सुदृढ़, शिल्प-ज्ञान-तकनीक।
लगन-परिश्रम से बने, बीहड़ में भी लीक।१३।
*
करें कल्पना शून्य में, पहले फिर साकार।
आंकें रूप अरूप में, यंत्री दे आकार।१४।
*
सिर्फ लक्ष्य पर ही रखें, हर पल अपनी दृष्टि।
अभियंता-मजदूर मिल, रचें नयी नित सृष्टि।१५।
*
सडक देश की धड़कनें, भवन ह्रदय पुल पैर।
वृक्ष श्वास-प्रश्वास दें, कर जीवन निर्वैर।१६।
*
भवन सेतु पथ से मिले, जीवन में सुख-चैन।
इनकी रक्षा कीजिए, सब मिलकर दिन-रैन।१७।
*
काँच न तोड़ें भवन के, मत खुरचें दीवार।
याद रखें हैं भवन ही, जीवन के आगार।१८।
*
भवन न गन्दा हो 'सलिल', सब मिल रखें खयाल।
कचरा तुरत हटाइए, गर दे कोई डाल।१९।
*
भवनों के चहुँ और हों, ऊँची वृक्ष-कतार।
शुद्ध वायु आरोग्य दे, पायें ख़ुशी अपार।२०।
*
कंकर से शंकर गढ़े, शिल्प ज्ञान तकनीक।
भवन गगनचुम्बी बनें, गढ़ सुखप्रद नव लीक।२१।
*
वहीं गढ़ें अट्टालिका जहाँ भूमि मजबूत।
जन-जीवन हो सुरक्षित, खुशियाँ मिलें अकूत।२२।
*
ऊँचे भवनों में रखें, ऊँचा 'सलिल' चरित्र।
रहें प्रकृति के मित्र बन, जीवन रहे पवित्र।२३।
*
रूपांकन हो भवन का, प्रकृति के अनुसार।
अनुकूलन हो ताप का, मौसम के अनुसार।२४।
*
वायु-प्रवाह बना रहे, ऊर्जा पायें प्राण।
भवन-वास्तु शुभ कर सके, मानव को सम्प्राण।२५।

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

RAKAM BAITHAK: 20-10-2013 Mumbai

||श्री चित्रगुप्ताय नमः||स्थापना- जयपुर सम्मेलन 23 जून, 2002
सम्पर्क-09431238623, 09935038843,09430255555

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद
(निबन्धन सं.0874/13 - राष्ट्रीय कार्यालय नई दिल्ली)
(भारत में स्थित कायस्थ सभाओं,कायस्थ संस्थाओं, श्री चित्रगुप्त मंदिरों,धर्मशालाओं,
शिक्षा संस्थाओं एवं समाज की पत्र-पत्रिकाओं के संचालकों/संपादकों का राष्ट्रीय परिसंघ)
प्रधान सचिवालय :- 209-210,इनकम टैक्स कालोनी,विनायकपुर,कानपुर208025 (उत्तर प्रदेश) 
मुख्यालय :-  फ्लैट सं०-जे.एफ.1/71,ब्लॉक सं०-6,रोड सं०-10,राजेन्द्र नगर,पटना-800016 (बिहार) 
________________________________________________________________________________________________________
पत्रांक :-341                                 अधिसूचना                            दिनांक :-30.07.2013

महापरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक, राजेश श्रीवास्तव(आयोजन संयोजक) के अनुरोध पर पूर्व निर्धारित तिथि 29 सितम्बर से बढाकर 20 अक्टूबर 2013 को नवी मुम्बई में ही आयोजित की गई है | इस बैठक में निम्नलिखित विषय-सूची पर विचारकर निर्णय लिया जायेगा |
                1. पिछली बैठक के कार्यवाही की संपुष्टि, राष्ट्रीय प्रधान महासचिव का प्रतिवेदन |
                2.राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष द्वारा आय व्यय का प्रतिवेदन,राष्ट्रीय संगठन मंत्री का प्रतिवेदन |
      3. अध्यक्ष की अनुमति से अन्य विषय पर विचार |
कार्यक्रम :
1.कार्य संचालक समिति की बैठक प्रातः 10 से 11।
2.राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 11.30 से.1.30।
3.भोजनावकाश 1.45 से 2.45। 
4.स्थानीय लोगों के साथ मिलन समारोह अपराहन 3 बजे से 4 बजे तक तत्पश्चात शहर भ्रमण। 
इस आयोजन हेतु राष्ट्रीय संयुक्त संगठन सचिव श्री राजेश  श्रीवास्तव मोबाइल सं. 08652371313, 08286201111 दूरभाष:022-65242888(आयोजन संयोजक), को अपने आगमन–प्रस्थान ट्रेन सं० सहित विवरण 15 दिन पहले अवश्य उपलब्ध कराने की कृपा करेंगे साथ ही अरबिन्द कुमार सिन्हा, राष्ट्रीय कोषाध्यक्षसहप्रशासनिक सचिव को भी उपलब्ध कराने की कृपा करेंगे ताकि आपकी व्यवस्था करने में सुविधा हो |कायस्थ नव जागरण आन्दोलन को गतिशील करने में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है इसलिए इस महत्वपूर्ण बैठक में सम्मिलित होने की अवश्य कृपा करें |
बैठक का स्थान एवं आवासीय स्थल चित्रगुप्त समाज वेलफेयर निर्माण प्रॉपर्टीज एवं डेवलपर,डी-8,सेक्टर-12,खारगर,नवी मुम्बई / आपलोगों से मेरा अनुरोध है कि अपना-अपना  टिकट शीघ्र आरक्षित करा लें| सभी प्रभारी से अनुरोध है की अपना-अपना संगठनात्मक रिपोर्ट जरुर लायें|
                                                            आपका
(डॉ० यू.सी.श्रीवास्तव)
राष्ट्रीय प्रधान महासचिव

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् : कार्यकारिणी समिति पुनर्गठित


राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद

(कायस्थ सभाओं / संस्थाओं / मंदिरों / धर्मशालाओं / शिक्षा संस्थाओं / पत्र पत्रिकाओं का परिसंघ )
: कार्यालय :
राष्ट्रीय अध्यक्ष: जे. ऍफ़. १/७१, ब्लोक ६, मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ बिहार 
वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: २०४ , विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाउन, जबलपुर, ४८२००१ मध्य प्रदेश 
महामंत्री: २०९-२१० आयकर कॉलोनी, विनायकपुर, कानपुर २०८०२५ उत्तर प्रदेश

प्रति:
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जयपुर दिनांक 28-10-2012। राष्ट्रीय चित्रगुप्त महापरिषद की केन्द्रीय कार्यकारिणी बैठक  राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री त्रिलोकी प्रसाद वर्मा मुजफ्फरपुर की अध्यक्षता में संपन्न हुई। बैठक में 6 राज्यों से पधारे 35 पदाधिकारी प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। महामंत्री चित्रांश डॉ. यू. सी. श्रीवास्तव कानपूर ने बैठक का सञ्चालन करते हुए सनातनधर्मियों के हितों पर कुठाराघात करने और अन्य धर्मावलम्बियों की हित रक्षा की नीति की आलोचना की। समग्र क्रांति आन्दोलन में जे.पी. के अनुयायी रहे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कुमार अनुपम ने बिहार में कायस्थ नव जागरण आन्दोलन की चर्चा की। राजस्थान प्रदेश के संयोजक श्री सचिन खरे तथा उपाध्यक्ष अरुण माथुर ने जातिवादी व्यवस्था को समाज के लिए घातक निरूपित किया। दुर्ग छतीसगढ़ से पधारे राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री अरुण श्रीवास्तव 'विनीत' ने वर्तमान दलीय राजनैतिक प्रणाली से उत्पन्न भ्रष्टाचार को घातक बताया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उत्तर प्रदेश श्री कमलकांत वर्मा ने अन्ना हजारे तथा केजरीवाल के आंदोलनों में समाज के समर्थन के प्रति आभार व्यक्त किया। 

राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष चित्रांश संजीव वर्मा 'सलिल' जबलपुर ने देव चित्रगुप्त तथा कायस्थ धर्म की व्याख्या वैदिक-पौराणिक प्रसंगों द्वारा करते हुए निम्न प्रस्ताव प्रस्तुत किये जो सर्व सम्मति से पारित किये गए। 

सामाजिक प्रस्ताव:

1. निराकार परात्पर परब्रम्ह अंश रूप में कायाओं में व्यापकर कायस्थ होते हैं। ऐसे सभी व्यक्ति जो इस सत्य को जानते और मानते हैं कायस्थ महावंश के अंग हैं। वर्ण, जाति, धर्म, पंथ, भाषा, भूषा, क्षेत्र या अन्य किसी भी आधार पर उनमें भेद स्वीकार्य नहीं हैं। महापरिषद में अहिन्दीभाषी सदस्य व पदाधिकारी बनाये जाएँ।

2. अन्य किसी भी पंथ / धर्म / मत के अनुयायी उक्त सूत्र को स्वीकार कर जड़-चेतन के प्रति समता-समानता-सद्भाव भाव धारणकर सनातन धर्म के कायस्थ महावंश में सम्मिलित हो सकते हैं। इस हेतु उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पालनकर अपने आचार-विचार को संयमित रखने, अन्य जनों की स्वतंत्रता की रक्षा करने तथा सबसे समतापरक व्यवहार करने का वचनपत्र देना होगा। 

3. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तथा लाल बहादुर शास्त्री जी के निधन संबंधी नस्तियां एवं कागजात सार्वजनिक किये जाएँ। नेताजी  का मृत्यु प्रमाणपत्र जारी किया जाए अथवा उनके अज्ञातवास की खोज की जाए तथा जिलाधिकारी फैजाबाद के नाजरात में रखे गुमनामी बाबा के सामान की जाँचकर सूची सार्वजानिक की जाए। 

4. सार्वजनिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ़ शंखनाद करते हुई कायस्थ समाज हर क्षेत्र में स्वच्छ छवि के उम्मीदवारों का समर्थन तथा मलिन छवि के उमीदवारों का सक्रिय विरोध करेगा। 

राजनैतिक प्रस्ताव:

5. केन्द्रीय मंत्रिमंडल से एक मात्र कायस्थमंत्री को उनके विरुद्ध गंभीर आरोप न होते हुए हटाने तथा गंभीर आरोपों से घिरे मंत्रियों को बनाये रखने का विरोध करते हुए कोंग्रेस अध्यक्ष को लिखा जाए। 

6. आरक्षण समाप्त किया जाए तथा सभी को योग्यतानुसार समान अवसर प्राप्ति सुनिश्चित की जाए अथवा सवर्णों के लिए आरक्षण सुनिश्चित कर कायस्थ, ब्राम्हण, क्षत्रिय तथा वैश्य को समान प्रतिशत दिया जाए। 

7. आगामी चुनावों को देखते हुए चुनाव क्षेत्रवार कायस्थ मतदाता संख्या, उपयुक्त उम्मीदवार तथा समर्थित उम्मीदवार का चयन किया जाए। टिकिट प्राप्ति पश्चात् सामाजिक समीकरणों का विवेचन कर नीति निर्धारण हेतु समिति का निर्माण किया जाए।

धार्मिक प्रस्ताव:

8. श्री चित्रगुप्त मंदिर उज्जैन, खजुराहो, अयोध्या, पटना तथा कांची के उन्नयन हेतु विशेष योजना बनाई जाए। डाक टिकिट जारी किया जाए। 

9. समकालिक कायस्थ महर्षियों महर्षि महेश योगी, सत्य साईं बाबा तथा सहजयोग प्रवर्तिका निर्मला देवी श्रीवास्तव पर डाक टिकिट जारी किया जाए। 

10. सनातन धर्मियों हेतु निर्धारित 16 संस्कारों की सामयिकता पर विचार के समय तथा प्रक्रिया का पुनर्निर्धारण किया जाए।

11. विक्रम संवत अनुसार वर्ष भर के तीज-त्योहारों के औचित्य,  पूजन-विधान आदि का निर्धारण कर पत्रक जारी किया जाए ताकि युवा पीढ़ी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा से अवगत हो सके।

12. कायस्थों तथा श्री चित्रगुप्त के उद्भव एवम योगदान पर शोधकर प्रामाणिक सामग्री प्रकाशित की जाए। 

अन्य:

14. गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे कायस्थों का सर्वेक्षण कर उन्हें आय वृद्धि के साधन तथा अवसर प्रदान किये जाएँ। 

14. निर्धन छात्रों को अध्ययन हेतु शिक्षण शुल्क तथा पुस्तकें प्रदान करने हेतु समर्थ कायस्थ जनों से संपर्क कर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। 

15. विधवा / विधुर विवाह, कन्या भ्रूण संरक्षण / बाल विवाह निषेध, कन्या-शिक्षा, पुत्र-पुत्री समानता, पौधारोपण, जल संरक्षण, पर्यावरण शुद्धिकरण, खुले स्थान पर शौच-निषेध, पुस्तकालय / वाचनालय स्थापना आदि कार्यक्रम इकाई  स्तर पर अपनाएं जाएं। 

इस सम्बन्ध में मार्गदर्शन हेतु संपर्क सूत्र:  
0761-2411131 / 094251 83244.
ॐ
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद
(कायस्थ सभाओं / संस्थाओं / मंदिरों / धर्मशालाओं / शिक्षा संस्थाओं / पत्र पत्रिकाओं का परिसंघ )
: कार्यालय :
राष्ट्रीय अध्यक्ष: जे. ऍफ़. १/७१, ब्लोक ६, मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ बिहार
वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: २०४ , विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाउन, जबलपुर, ४८२००१ मध्य प्रदेश
महामंत्री: २०९-२१० आयकर कॉलोनी, विनायकपुर, कानपुर २०८०२५ उत्तर प्रदेश

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क्रमांक: ०५२ / राकाम / वराउ / २०१२                             जबलपुर, दिनाँक: ७.१०.२०१२
प्रतिष्ठार्थ:
आदरणीय संपादक जी,
सादर प्रकाशनार्थ विज्ञप्ति संलग्न है.
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् : कार्यकारिणी समिति पुनर्गठित
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद् कायस्थ समाज की कायस्थ सभाओं / संस्थाओं / मंदिरों / धर्मशालाओं / शिक्षा संस्थाओं / पत्र पत्रिकाओं का राष्ट्र व्यापी परिसंघ है जिसके सदस्य भारत से बाहर विदेशों में भी हैं. यह एक जातीय संस्था मात्र नहीं है अपितु उन सभी का परिसंघ है जो मानते हैं कि परमपिता परमात्मा एक है जिसके विविध रूपों की उपासना विविध पंथों के माध्यम से करनेवाले सभी धर्मावलंबी समान हैं. अतः, मनुष्य मात्र में देश, लिंग, धर्म, पंथ, जाति, भाषा, विचारधारा, दल, प्रान्त, क्षेत्र ,परिवार, या अन्य आधार पर के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव किया जाना गलत है. सभी को योग्यता वृद्धि हेतु समान अवसर, योग्यतानुसार कार्य, पदोन्नति- अवसर, आय, प्रतिष्ठा, संपत्ति आदि अर्जित करने के समान अवसर मिलने चाहिए.

महापरिषद की पुनर्गठित राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति निम्नानुसार है:

राष्ट्रीय अध्यक्ष: चित्रांश त्रिलोकी प्रसाद वर्मा, रामसखीनिवास,  मुजफ्फरपुर८४२००२. चलभाष: ०९८३८५२३०२९, ईमेल: trilokeeverma@gmail.com. 
वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: चित्रांश आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', समन्वयम, २०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१. दूरभाष : ०७६१ २४१११३१ / चलभाष: ९४२५१ ८३२४४. ई मेल: salil.sanjiv@gmail.com, वैब:hindihindi.in.divyanarmada
ब्लॉग: rashtreeykayasthamahaparishad.blogspot.com  
वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष: चित्रांश राकेश निगम, झाँसी ०९४१५१४३४७६
राष्ट्रीय महासचिव: चित्रांश डॉ. यू. सी. श्रीवास्तव, २०९ आयकर कोलोनी, विनायकपुर, कानपुर २०८०२५, ०९९३५०३८८४३ ई मेल: drucshrivastava@gmail.com
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (बिहार): चित्रांश कुमार अनुपम पटना, ०९४३१४ २६९९१
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (उ.प्र.): चित्रांश कमलकांत वर्मा, लखनऊ ०९४५२६७४०१२
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (छत्तीसगढ़): चित्रांश राजेश सक्सेना ०९८२६१८३२४७
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष(उ.प्र.): चित्रांश चारूचन्द्र खरे, बांदा ०९४१५१४४०४७
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (राज.): चित्रांश भागवतस्वरूप कुलश्रेष्ठ 
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (म.प्र.): चित्रांश दिनेश प्रसाद सिन्हा, उज्जैन ०९०२५३३२६७६
संयोजक (राज.): चित्रांश सचिन खरे, डी ३ / १९९ चित्रकूट योजना, वैशाली जयपुर ३०२०२१, चलभाष: ९४६०३- ०३९६९, ई मेल: mail@sachinbjp.comजयपुर.
महासचिव (संगठन): चित्रांश अरुण श्रीवास्तव 'विनीत', शांति कुञ्ज २१/५८५ सिंधिया नगर दुर्ग ४९१००२ चलभाष: ०९४२५२०१२५१ ईमेल: arunchitransh@gmail.com
कोषाध्यक्ष: चित्रांश अरविन्द कुमार सिन्हा, पटना ०९४३१०७७५५५ 
अंकेक्षक: चित्रांश अनुग्रह श्रीवास्तव, ०९३३६८५५४१७
प्रचार सचिव: चित्रांश प्रशांत कुमार सिन्हा, दिल्ली ०९८११६८४५९३
संयुक्त सचिव: चित्रांश दिनकर वर्मा, नई दिल्ली
संयुक्त सचिव : चित्रांश डॉ. प्रमोद कुमार सिन्हा, पटना
प्रवक्ता: चित्रांश अरुण माथुर, जयपुर ०९९२९६२८४३९
सलाहकार: चित्रांश अशोक सिन्हा, पटना ०९९३९७२३८८५
सलाहकार: चित्रांश अशोक श्रीवास्तव, नोएडा ०९३१२२०४३१३
कार्यकारिणी सदस्य: सर्व चित्रांश आनंदमोहन श्रीवास्तव जौनपुर, विनयमोहन श्रीवास्तव उज्जैन, सतीशचन्द्र श्रीवास्तव झाँसी, शिवप्रसाद श्रीवास्तव बनारस, के. के. सिन्हा अयोध्या, सच्चिदानन्द श्रीवास्तव अयोध्या, अयोध्या प्रसाद निगम हमीरपुर, ब्रजेश सक्सेना हमीरपुर,

समन्वयक: चित्रांश व्ही. पी. श्रीवास्तव, कानपुर ०९८३८५२३०२९
मार्गदर्शक मंडल: सर्व चित्रांश विनोद बिहारी वर्मा लखनऊ, केदारनाथ सिन्हा वाराणसी, प्रदीप वर्मा वाराणसी, अखौरी विजयप्रकाश सिन्हा औरंगाबाद, बिन्ध्येश्वरी प्रसाद सिन्हा बलरामपुर, के. पी सहाय कोटा, आलोक श्रीवास्तव नागपुर, ब्रजेन्द्र कुमार श्रीवास्तव गया, कृष्णमंगल सिंह कुलश्रेष्ठ उज्जैन, जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव अयोध्या, हरेन्द्र कुमार पटना.

महापरिषद् मानव समानता के प्रति विश्वास करनेवाले सभी जनों का आव्हान करती है कि एक जुट होकर राष्ट्र व समाज निर्माण की नव चेतना जाग्रत कर भ्रष्टाचार तथा आरक्षण के विरुद्ध संघर्ष कर सामाजिक / राजनैतिक / आर्थिक शुचिता अपना कर देश को सशक्त बनाने में योगदान करें. सर्वाधिक शांतिप्रिय, बुद्धिजीवी तथा कर्मठ कायस्थ अन्य समाजों के सदस्यों से  सामाजिक नवचेतना जागृत करने में महापरिषद तथा श्री सचिन खरे से डी ३ / १९९ चित्रकूट योजना, वैशाली जयपुर ३०२०२१, चलभाष: ९४६०३- ०३९६९, ई मेल: mail@sachinbjp.com  पर संपर्क कर सहयोग करने का अनुरोध है.


                                                                       चित्रांश आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'                                                                                      वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष
चलभाष : 9425183244, दूरभाष: 0761-2411131
E-mail: salil.sanjiv@gmail.com
hindihindi.in.divyanarmada
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मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II ( मूल पाठ-तद्रिन हिंदी काव्यानुवाद-संजीव 'सलिल' )

 II  ॐ II

II श्री महालक्ष्यमष्टक स्तोत्र II 

( मूल पाठ-तद्रिन हिंदी काव्यानुवाद-संजीव 'सलिल' )

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते I
शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II१II

सुरपूजित श्रीपीठ विराजित, नमन महामाया शत-शत.
शंख चक्र कर-गदा सुशोभित, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

नमस्ते गरुड़ारूढ़े कोलासुर भयंकरी I
सर्व पापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II२II

कोलाsसुरमर्दिनी भवानी, गरुड़ासीना नम्र नमन.
सरे पाप-ताप की हर्ता,  नमन महालक्ष्मी शत-शत..

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी I
सर्व दु:ख हरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II३II

सर्वज्ञा वरदायिनी मैया, अरि-दुष्टों को भयकारी.
सब दुःखहरनेवाली, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

सिद्धि-बुद्धिप्रदे देवी भुक्ति-मुक्ति प्रदायनी I
मन्त्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II४II

भुक्ति-मुक्तिदात्री माँ कमला, सिद्धि-बुद्धिदात्री मैया.
सदा मन्त्र में मूर्तित हो माँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

आद्यांतर हिते देवी आदिशक्ति महेश्वरी I
योगजे योगसंभूते महालक्ष्मी नमोsस्तुते II५II

हे महेश्वरी! आदिशक्ति हे!, अंतर्मन में बसो सदा.
योग्जनित संभूत योग से, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

स्थूल-सूक्ष्म महारौद्रे महाशक्ति महोsदरे I
महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोsस्तुते II६II

महाशक्ति हे! महोदरा हे!, महारुद्रा  सूक्ष्म-स्थूल.
महापापहारी श्री देवी, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी I
परमेशीजगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II७II

कमलासन पर सदा सुशोभित, परमब्रम्ह का रूप शुभे.
जगज्जननि परमेशी माता, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

श्वेताम्बरधरे देवी नानालंकारभूषिते I
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोsस्तुते II८II

दिव्य विविध आभूषणभूषित, श्वेतवसनधारे मैया.
जग में स्थित हे जगमाता!, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

महा लक्ष्यमष्टकस्तोत्रं य: पठेद्भक्तिमान्नर: I
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यंप्राप्नोति सर्वदा II९II

जो नर पढ़ते भक्ति-भाव से, महालक्ष्मी का स्तोत्र.
पाते सुख धन राज्य सिद्धियाँ, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

एककालं पठेन्नित्यं महापाप विनाशनं I
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धन-धान्यसमन्वित: II१०II

एक समय जो पाठ करें नित, उनके मिटते पाप सकल.
पढ़ें दो समय मिले धान्य-धन, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रु विनाशनं I
महालक्ष्मीर्भवैन्नित्यं प्रसन्नावरदाशुभा II११II

तीन समय नित अष्टक पढ़िये, महाशत्रुओं का हो नाश.
हो प्रसन्न वर देती मैया, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

 II तद्रिन्कृत: श्री महालक्ष्यमष्टकस्तोत्रं संपूर्णं  II

तद्रिंरचित, सलिल-अनुवादित, महालक्ष्मी अष्टक पूर्ण.
नित पढ़ श्री समृद्धि यश सुख लें, नमन महालक्ष्मी शत-शत..

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

यम द्वितीय चित्रगुप्त पूजन पर विशेष भेंट: भजन: प्रभु हैं तेरे पास में... -- संजीव 'सलिल'

यम द्वितीय चित्रगुप्त पूजन पर विशेष भेंट:
भजन:
प्रभु हैं तेरे पास में...
-- संजीव 'सलिल'
*
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...
*
तन तो धोता रोज न करता, मन को क्यों तू साफ रे!
जो तेरा अपराधी है, उसको करदे हँस माफ़ रे..
प्रभु को देख दोस्त-दुश्मन में, तम में और प्रकाश में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...
*
चित्र-गुप्त प्रभु सदा चित्त में, गुप्त झलक नित देख ले.
आँख मूंदकर कर्मों की गति, मन-दर्पण में लेख ले..
आया तो जाने से पहले, प्रभु को सुमिर प्रवास में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...
*
मंदिर-मस्जिद, काशी-काबा मिथ्या माया-जाल है.
वह घट-घट कण-कणवासी है, बीज फूल-फल डाल है..
हर्ष-दर्द उसका प्रसाद, कडुवाहट-मधुर मिठास में.
कहाँ खोजता मूरख प्राणी?, प्रभु हैं तेरे पास में...
*
भजन:
प्रभु हैं तेरे पास में...                                                                           
संजीव 'सलिल'
*
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...
*
निराकार काया में स्थित, हो कायस्थ कहाते हैं.
रख नाना आकार दिखाते, झलक तुरत छिप जाते हैं..
प्रभु दर्शन बिन मन हो उन्मन,
प्रभु दर्शन कर परम शांत मन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...
*
कोई न अपना सभी पराये, कोई न गैर सभी अपने हैं.
धूप-छाँव, जागरण-निद्रा, दिवस-निशा प्रभु के नपने हैं..
पंचतत्व प्रभु माटी-कंचन,
कर मद-मोह-गर्व का भंजन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...
*
नभ पर्वत भू सलिल लहर प्रभु, पवन अग्नि रवि शशि तारे हैं.
कोई न प्रभु का, हर जन प्रभु का, जो आये द्वारे तारे हैं.. 
नेह नर्मदा में कर मज्जन,
प्रभु-अर्पण करदे निज जीवन.
जग असार सार हरि सुमिरन ,
डूब भजन में ओ नादां मन...
*

Acharya Sanjiv Salil

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शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

: साहित्य समाचार: मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् : २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन जबलपुर, २०-२-२०११

: साहित्य समाचार:
मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् : २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन
    जबलपुर, २०-२-२०११, 
अरिहंत होटल, रसल चौक, जबलपुर

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' व अन्य लघुकथाकार सम्मानित होंगे

जबलपुर. लघुकथा के क्षेत्र में सतत सक्रिय रचनाकारों कर अवदान को प्रति वर्ष सम्मानित करने हेतु प्रसिद्ध संस्था मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् का २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन अरिहंत होटल, रसल चौक, जबलपुर में २०-२-२०११ को अपरान्ह १ बजे से आमंत्रित है.

परिषद् के अध्यक्ष मो. मोइनुद्दीन 'अतहर' तथा सचिव कुँवर प्रेमिल द्वारा प्रसरित विज्ञप्ति के अनुसार इस वर्ष ७ लघुकथाकारों को उनके उल्लेखनीय अवदान हेतु सम्मानित किया जा रहा है.

ब्रिजबिहारीलाल श्रीवास्तव सम्मान - श्री संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर.
सरस्वती पुत्र सम्मान -                   श्री पारस दासोत जयपुर.
रासबिहारी पाण्डेय सम्मान -           श्री अनिल अनवर, जोधपुर.
डॉ. श्रीराम ठाकुर दादा सम्मान -      श्री अशफाक कादरी बीकानेर.
जगन्नाथ कुमार दास सम्मान-        श्री डॉ. वीरेन्द्र कुमार दुबे, जबलपुर.
गोपालदास सम्मान -                     डॉ. राजकुमारी शर्मा 'राज', गाज़ियाबाद.
आनंदमोहन अवस्थी सम्मान-         डॉ. के बी. श्रीवास्तव, मुजफ्फरपुर- मो. मोइनुद्दीन 'अतहर', जबलपुर.

कार्यक्रम प्रो. डॉ. हरिराज सिंह 'नूर' पूर्व कुलपति इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्षता, प्रो. डॉ. जे. पी. शुक्ल पूर्व कुलपति रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के मुख्यातिथ्य तथा श्री राकेश 'भ्रमर', श्री अंशलाल पंद्रे व श्री निशिकांत चौधरी के विशेषातिथ्य में संपन्न होगा.

इस अवसर पर मो. मोइनुद्दीन 'अतहर' द्वारा सम्पादित परिषद् की लघुकथा केन्द्रित पत्रिका अभिव्यक्ति के जनवरी-मार्च २०११ अंक, श्री कुँवर प्रेमिल द्वारा सम्पादित प्रतिनिधि लघुकथाएँ २०११  तथा श्री मनोहर शर्मा 'माया' लिखित लघुकथाओं के संग्रह मकड़जाल का विमोचन संपन्न होगा.

द्वितीय सत्र में डॉ. तनूजा चौधरी व डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' लघु कथा के अवदान, चुनौती और भविष्य विषय पर विचार अभिव्यक्ति करेंगे.
*****************
         

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शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

चिट्ठा चर्चा : रेखा श्रीवास्तव जी : LBA की नयी अध्यक्षा

चिट्ठा  चर्चा :

रेखा श्रीवास्तव जी : LBA की नयी अध्यक्षा

                                        आईये तहे-दिल से आपका स्वागत करें.

यह घोषणा करते हुए बहुत ही हर्ष का अनुभव हो रहा है कि LBA की नयी अध्यक्षा  रेखा श्रीवास्तव जी को नियुक्त किया गया है.
रेखा जी का परिचयउन्हीं की ज़ुबानी-
"मैं आई आई टी , कानपूर में मशीन अनुवाद प्रोजेक्ट में कार्य कर रही हूँ. इस दिशा में हिंदी के लिए किये जा रहे प्रयासों से वर्षों से जुड़ी हूँ. लेखन मेरा सबसे प्रिय और पुरानी आदत है. आदर्श और सिद्धांत मुझे सबसे मूल्यवान लगते हैं , इनके साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है. गलत को सही दिशा का भान कराना मेरी मजबूरी है , वह बात और है कि मानने वाला उसको माने या न माने. सच को लिखने में कलम संकोच नहीं करती."

परिवर्तन प्रकृति का नियम है
कहते हैं कि इस दुनियाँ की हर चीज़ बदलती रहती है. हालात बदलते रहते हैं और हालात को सँभालने वाले इंसान भी बदलते रहते हैं इसीलिए LBA की पारीवारिक हालात सँभालने के लिए प्रेसिडेंट पद के लिए नियुक्त किया गया है- रेखा श्रीवास्तव को ! रेखा श्रीवास्तव जी एक पुख्ता सोच और संतुलित व्यवहार की मालिक हैं, वहीँ वह हिन्दी के लिए पूर्ण रूप से समर्पित भी हैं. वह ब्लॉग-जगत में ही नहीं बल्कि बाहर भी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार के नाम से जानी जाती हैं. उनका नाम ब्लॉग जगत में भी किसी परिचय का मोहताज नहीं है, एक लम्बे अरसे से वे ब्लॉग जगत में सक्रिय हैं और ऊँचा मुकाम रखती हैं. LBA के कार्यकारिणी के पदाधिकारीगण और सदस्यों से अनुरोध है कि वे अपने नए प्रेसिडेंट का स्वागत तहेदिल और जोश-ओ-ख़रोश से करें.

इसी के साथ मैं यह भी ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि पिछले काफ़ी समय से चन्द ब्लॉगर्स (LBA सदस्य) को छोड़ के काफ़ी ब्लॉगर्स ऐसे भी हैं जो LBA पर अपनी पोस्ट नहीं डाल रहे हैं, उनसे अनुरोध है कि वे अपने निजी ब्लॉग के साथ-साथ LBA पर भी अपनी पोस्ट डालें. आजकल बहुत से मुद्दे ऐसे हैं जिन पर जागरूकता की आवश्यकता है. LBA का मंच आज सशक्त है और उनका विचार उनके निजी ब्लॉग कि अपेक्षा और ज़्यादा यहाँ LBA पर प्रचार पा सकता है. हिन्दी और हिन्दी भाषी हित के लिए समर्पित इस ब्लॉग पर पूरा योगदान दें!

ध्यान देने योग्य कुछ और बातें
मार्गदर्शन निति नियम के अभाव में विगत कुछ दिनों से जो हालात पैदा हुए वे फ़िर न पैदा हों इसके लिए जल्द ही निति-निर्देश को अंतिम रूप दे कर लागू कर दिए जायेंगे. इस सन्दर्भ में नयी अध्यक्षा सहित LBA के सभी ख़ास-ओ-आम सदस्यों से अपील है कि वे अपना अमूल्य सुझाव दें. हाँ, कुछ बातें अभी से लागू की जा रही हैं जो नीति निर्देश का हिस्सा अवश्य ही होंगी कि किसी भी जायज़ सवाल को सभ्य तरीक़े से पूछना का हक़ सबको है, यहाँ तक कि वह LBA का सदस्य हो अथवा नहीं लेकिन इतना ध्यान अवश्य ही रखना होगा कि संयोजक और अध्यक्षा की पोस्ट के जवाब में पुनः पोस्ट न डाली जाए बल्कि उनकी उसी पोस्ट में टिपण्णी करके अपने विचार प्रस्तुत किये जाएँ.

===
उपाध्यक्ष जनाब एस. एम. मासूम जी को नियुक्त किया गया है. वे एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर हैं और वर्तमान में 'देश की मर्यादा' नामक मैगजीन के ब्यूरो चीफ़ हैं. वे मूल रूप से जौनपुर, उत्तर प्रदेश से वाबस्ता है. उनका पुख्ता तरीक़े से यह मानना है कि ब्लॉगर्स की आवाज़ बड़ी दूर तक जाती है इसलिए ब्लॉगर्स इसका सही इस्तेमाल करें. क़लम का इस्तेमाल इंसानियत के हित में करें. अमन का पैगाम नामक ब्लॉग इनका काफ़ी चर्चा में रहता है. रेखा श्रीवास्तव जी और जनाब एस.एम. मासूम दोनों ही विश्व के सबसे बड़े सामुदायिक ग़ैर-मुनाफ़ा ब्लॉग ऑल इंडिया ब्लॉगर्स एसोसियेशन के सदस्य भी है.

पुनश्च रेखा श्रीवास्तव जी को अध्यक्षा और जनाब एस.एम. मासूम को उपाध्यक्ष बनाये जाने पर बहुत-बहुत बधाई.
आभार: लखनऊ ब्लोगर्स असोसिएशन 

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

बिदाई गीत: अलविदा दो हजार दस... संजीव 'सलिल


बिदाई गीत:


अलविदा दो हजार दस...

संजीव 'सलिल'
*
अलविदा दो हजार दस
स्थितियों पर
कभी चला बस
कभी हुए बेबस.
अलविदा दो हजार दस...

तंत्र ने लोक को कुचल
लोभ को आराधा.
गण पर गन का
आतंक रहा अबाधा.
सियासत ने सिर्फ
स्वार्थ को साधा.
होकर भी आउट न हुआ
भ्रष्टाचार पगबाधा.
बहुत कस लिया
अब और न कस.
अलविदा दो हजार दस...

लगता ही नहीं, यही है
वीर शहीदों और
सत्याग्रहियों की नसल.
आम्र के बीज से
बबूल की फसल.
मंहगाई-चीटी ने दिया 
आवश्यकता-हाथी को मसल.
आतंकी-तिनका रहा है
सुरक्षा-पर्वत को कुचल.
कितना धंसेगा?
अब और न धंस.
अलविदा दो हजार दस...
 
*******************


शुभाकांक्षा :

विनय यही है आपसे सुनिए हे सलिलेश!

रहें आपके द्वार पर खुशियाँ अगिन हमेश..

नये वर्ष में कट सकें भव-बाधा के पाश.

अँगना में फूलें 'सलिल' यश के पुष्प पलाश.. 

 ***********

नव वर्ष पर नवगीत: महाकाल के महाग्रंथ का --संजीव 'सलिल'

नव वर्ष पर नवगीत: 

महाकाल के महाग्रंथ का --

संजीव 'सलिल'

*
महाकाल के महाग्रंथ का

नया पृष्ठ फिर आज खुल रहा....

*
वह काटोगे,

जो बोया है.

वह पाओगे,

जो खोया है.

सत्य-असत, शुभ-अशुभ तुला पर

कर्म-मर्म सब आज तुल रहा....
*
खुद अपना

मूल्यांकन कर लो.

निज मन का

छायांकन कर लो.

तम-उजास को जोड़ सके जो

कहीं बनाया कोई पुल रहा?...

*
तुमने कितने

बाग़ लगाये?

श्रम-सीकर

कब-कहाँ बहाए?

स्नेह-सलिल कब सींचा?

बगिया में आभारी कौन गुल रहा?...

*

स्नेह-साधना करी

'सलिल' कब.

दीन-हीन में

दिखे कभी रब?

चित्रगुप्त की कर्म-तुला पर

खरा कौन सा कर्म तुल रहा?...

*
खाली हाथ?

न रो-पछताओ.

कंकर से

शंकर बन जाओ.

ज़हर पियो, हँस अमृत बाँटो.

देखोगे मन मलिन धुल रहा...

**********************
Acharya Sanjiv Salil

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शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

देहावसान : वयोवृद्ध शिक्षाविद-अर्थशास्त्री प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव -संजीव वर्मा 'सलिल'

देहावसान : वयोवृद्ध शिक्षाविद-अर्थशास्त्री प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव 

  -संजीव वर्मा 'सलिल'

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ २८.११.२०१०. स्थानीय अपोलो चिकित्सालय में आज देर रात्रि विख्यात अर्थशास्त्री, छत्तीसगढ़ राज्य में महाविद्यालायीन शिक्षा के सुदृढ़ स्तम्भ रहे अर्थशास्त्र की ३ उच्चस्तरीय पुस्तकों के लेखक, प्रादेशिक कायस्थ महासभा मध्यप्रदेश के पूर्व प्रांतीय अध्यक्ष रोटेरियन, लायन प्रो. सत्य सहाय का लम्बी बीमारी के पश्चात् देहावसान हो गया. खेद है कि छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार आपने प्रदेश के इस गौरव पुरुष के प्रति पूरी तरह अनभिज्ञ तथा असावधान रही. वर्ष १९९४ से पक्षाघात (लकवे) से पीड़ित प्रो. सहाय शारीरिक पीड़ा को चुनौती देते हुए भी सतत सृजन कर्म में संलग्न रहे. शासन सजग रहकर उन्हें राजकीय अतिथि के नाते एम्स दिल्ली या अन्य उन्नत चिकित्सालय में भेजकर श्रेष्ठ विशेषज्ञों की सेवा उपलब्ध कराता तो वे रोग-मुक्त हो सकते थे.

१६ वर्षों से लगातार पक्षाघात (लकवा) ग्रस्त तथा शैयाशाई होने पर भी उनके मन-मष्तिष्क न केवल स्वस्थ्य-सक्रिय रहा अपितु उनमें सर्व-हितार्थ कुछ न कुछ करते रहने की अनुकरणीय वृत्ति भी बनी रही. वे लगातार न केवल अव्यवसायिक सामाजिक पत्रिका 'संपर्क' का संपादन-प्रकाशन करते रहे अपितु इसी वर्ष उन्होंने 'राम रामायण' शीर्षक लघु पुस्तक का लेखन-प्रकाशन किया था. इसमें रामायण का महत्त्व, रामायण सर्वप्रथम किसने लिखी, शंकर जी द्वारा तुलसी को रामकथा साधारण बोल-चाल की भाषा में लिखने की सलाह, जब तुलसी को हनुमानजी ने श्रीराम के दर्शन करवाये, रामकथा में हनुमानजी की उपस्थिति, सीताजी का पृथ्वी से पैदा होना, रामायण कविता नहीं मंत्र, दशरथ द्वारा कैकेयी को २ वरदान, श्री राम द्वारा श्रीभरत को अयोध्या की गद्दी सौपना, श्री भारत द्वारा कौशल्या को सती होने से रोकना, रामायण में सर्वाधिक उपेक्षित पात्र उर्मिला, सीता जी का दूसरा वनवास, रामायण में सुंदरकाण्ड, हनुमानजी द्वारा शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराना, परशुराम प्रसंग की सचाई, रावण के अंतिम क्षण, लव-कुश काण्ड, सीताजी का पृथ्वी की गोद में समाना, श्री राम द्वारा बाली-वध, शूर्पनखा-प्रसंग में श्री राम द्वारा लक्ष्मण को कुँवारा कहा जाना, श्री रामेश्वरम की स्थापना, सीताजी की स्वर्ण-प्रतिमा, रावण के वंशज, राम के बंदर, कैकेई का पूर्वजन्म, मंथरा को अयोध्या में रखेजाने का उद्देश्य, मनीराम की छावनी, पशुओं के प्रति शबरी की करुणा, सीताजी का राजयोग न होना, सीताजी का रावण की पुत्री होना, विभीषण-प्रसंग, श्री राम द्वारा भाइयों में राज्य-विभाजन आदि जनरूचि के रोचक प्रसंगों का उल्लेख किया है. गागर में सागर की तरह विविध प्रसंगों को समेटे यह कृति प्रो. सहाय की जिजीविषा का पुष्ट-प्रमाण है.

प्रो. सत्यसहाय जीवंत व्यक्तित्व, कर्मठ कृतित्व तथा मौलिक मतित्व की त्रिविभूति-संपन्न ऐसे व्यक्तित्व थे जिन पर कोई भी राज्य-सत्ता गर्व कर सकती है. ग्राम रनेह (राजा नल से समबन्धित ऐतिहासिक नलेह), तहसील हटा (राजा हट्टेशाह की नगरी), जिला दमोह (रानी दमयन्ती की नगरी) में जन्में, बांदकपुर स्थित उपज्योतिर्लिंग जागेश्वरनाथ पुण्य भूमि के निवासी संपन्न-प्रतिष्ठित समाजसेवी स्व. सी.एल. श्रीवास्तव तथा धर्मपरायण स्व. महारानी देवी के कनिष्ठ पुत्र सत्यसहाय की प्राथमिक शिक्षा रनेह, ग्राम, उच्चतर माध्यमिक शिक्षा दमोह तथा महाविद्यालयीन शिक्षा इलाहाबाद में अग्रज स्व. पन्नालाल श्रीवास्तव (आपने समय के प्रखर पत्रकार, दैनिक लीडर तथा अमृत बाज़ार पत्रिका के उपसंपादक, पत्रकारिता पर महत्वपूर्ण पुस्तक के लेखक) के सानिंध्य में पूर्ण हुई. अग्रज के पद-चिन्हों पर चलते हुए पत्रकारिता के प्रति लगाव स्वाभाविक था. उनके कई लेख, रिपोर्ताज, साक्षात्कार आदि प्रकाशित हुए. वे लीडर पत्रिका के फ़िल्मी स्तम्भ के संपादक रहे. उनके द्वारा फ़िल्मी गीत-गायक स्व. मुकेश व गीता राय का साक्षात्कार बहुचर्चित हुआ.

उन्हीं दिनों महात्मा गाँधी के निजी सचिव स्व. महेशदत्त मिश्र पन्नालाल जी के साथ रहकर राजनीति शास्त्र में एम.ए. कर रहे थे. तरुण सत्यसहाय को गाँधी जी की रेलयात्रा के समय बकरीका ताज़ा दूध पहुँचाने का दायित्व मिला. गाँधी जी की रेलगाड़ी इलाहाबाद पहुँची तो भरी भीड़ के बीच छोटे कद के सत्यसहाय जी नजर नहीं आये, रेलगाड़ी रवाना होने का समय हो गया तो मिश्रजी चिंतित हुए, उन्होंने आवाज़ लगाई 'सत्य सहाय कहाँ हो? दूध लाओ.' भीड़ में घिरे सत्यसहाय जी जोर से चिल्लाये 'यहाँ हूँ' और उन्होंने दूध का डिब्बा ऊपर उठाया, लोगों ने देखा मिश्र जी डब्बा पकड़ नहीं पा रहे और रेलगाड़ी रेंगने लगी तो कुछ लम्बे लोगों ने सहाय जी को ऊपर उठाया, मिश्र जी ने लपककर डब्बा पकड़ा. बापू ने खिड़की से यह दृश्य देखा तो खिड़कीसे हाथ निकालकर उन्हें आशीर्वाद दिया. मिश्रा जी के सानिंध्य में वे अनेक नेताओं से मिले. सन १९४८ में अर्थशास्त्र में एम.ए. करने के पश्चात् नव स्वतंत्र देश का भविष्य गढ़ने और अनजाने क्षेत्रों को जानने-समझने की ललक उन्हें बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ले आयी.

पन्नालाल जी अमृत बाज़ार पत्रिका और लीडर जैसे राष्ट्रीय अंग्रेजी अख़बारों में संवाददाता और उपसंपादक रहे थे. वे मध्य प्रान्त और विदर्भ के नेताओं को राष्ट्री क्षितिज में उभारने में ही सक्रिय नहीं रहे अपितु मध्य अंचल के तरुणों को अध्ययन और आजीविका जुटने में भी मार्गदर्शक रहे. विख्यात पुरातत्वविद राजेश्वर गुरु उनके निकट थे, जबलपुर के प्रसिद्द पत्रकार रामेश्वर गुरु को अपना सहायक बनाकर पन्नालाल जी ने संवाददाता बनाया था. कम लोग जानते हैं मध्य-प्रदेश उच्च न्यायालय के विद्वान् अधिवक्ता श्री राजेंद्र तिवारी भी प्रारंभ में प्रारंभ में पत्रकार ही थे. उन्होंने बताया कि वे स्थानीय पत्रों में लिखते थे. गुरु जी का जामाता होने के बाद वे पन्नालाल जी के संपर्क में आये तो पन्नालाल जी ने अपना टाइपराइटर उन्हें दिया तथा राष्ट्रीय अख़बारों से रिपोर्टर के रूप में जोड़ा. अपने अग्रज के घर में अंचल के युवकों को सदा आत्मीयता मिलते देख सत्य सहाय जी को भी यही विरासत मिली.

आदर्श शिक्षक तथा प्रशासनविद:

बुंदेलखंड में कहावत है 'जैसा पियो पानी, वैसी बोलो बनी, जैसा खाओ अन्न, वैसा होए मन'- सत्यसहाय जी के व्यक्तित्व में सुनार नदी के पानी साफगोई, नर्मदाजल की सी निर्मलता व गति तथा गंगाजल की पवित्रता तो थी ही बिलासपुर छत्तीसगढ़ में बसनेपर अरपा नदीकी देशजता और शिवनाथ नदीकी मिलनसारिता सोने में सुहागा की तरह मिल गई. वे स्थानीय एस.बी.आर. महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के व्याख्याता हो गये. उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व, सरस-सटीक शिक्षण शैली, सामयिक उदाहरणों से विषय को समझाने तथा विद्यार्थी की कठिनाई को समझकर सुलझाने की प्रवृत्ति ने उन्हें सर्व-प्रिय बना दिया. जहाँ पहले छात्र अर्थशास्त्र विषय से दूर भागते थे, अब आकर्षित होने लगे. सन १९६४ तक उनका नाम स्थापित तथा प्रसिद्ध हो चुका था. इस मध्य १९५८ से १९६० तक उन्होंने नव-स्थापित 'ठाकुर छेदीलाल महाविद्यालय जांजगीर' के प्राचार्य का चुनौतीपूर्ण दायित्व सफलतापूर्वक निभाया और महाविद्यालय को सफलता की राह पर आगे बढ़ाया. उस समय शैक्षणिक दृष्टि से सर्वाधिक पिछड़े राज्य छत्तीसगढ़ में उच्च शिक्षा की दीपशिखा प्रज्वलित करनेवालों में अग्रगण्य स्व. सत्य सहाय अपनी मिसाल आप थे.जांजगीर महाविद्यालय सफलतापूर्वक चलने पर वे वापिस बिलासपुर आये तथा योजना बनाकर एक अन्य ग्रामीण कसबे खरसिया के विख्यात राजनेता-व्यवसायी स्व. लखीराम अग्रवाल प्रेरित कर महाविद्यालय स्थापित करने में जुट गये. लम्बे २५ वर्षों तक प्रांतीय सरकार से अनुदान प्राप्तकर यह महाविद्यालय शासकीय महाविद्यालय बन गया. इस मध्य प्रदेश में विविध दलों की सरकारें बनीं... लखीराम जी तत्कालीन जनसंघ से जुड़े थे किन्तु सत्यसहाय जी की समर्पणवृत्ति, सरलता, स्पष्टता तथा कुशलता के कारण यह एकमात्र महाविद्यालय था जिसे हमेशा अनुदान मिलता रहा.

उन्होंने रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर में अधिष्ठाता छात्र-कल्याण परिषद्, अधिष्ठाता महाविद्यालयीन विकास परिषद् तथा निदेशक जनजाति प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण के रूप में भी अपनी कर्म-कुशलता की छाप छोड़ी.
आपके विद्यार्थियों में स्व. बी.आर. यादव, स्व. राजेंद्र शुक्ल. श्री अशोक राव, श्री सत्यनारायण शर्मा आदि अविभाजित मध्यप्रदेश / छतीसगढ़ के कैबिनेट मंत्री, पुरुषोत्तम कौशिक केन्द्रीय मंत्री तथा स्व. श्रीकांत वर्मा सांसद और राष्ट्रीय राजनीति के निर्धारक रहे. अविभाजित म.प्र. के वरिष्ठ नेता स्वास्थ्य मंत्री स्व. डॉ. रामाचरण राय, शिक्षामंत्री स्व. चित्रकांत जायसवाल से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे. उनके अनेक विद्यार्थी उच्चतम प्रशासनिक पदों पर तथा कई कुलपति, प्राचार्य, निदेशक आदि भी हुए किन्तु सहाय जी ने कभी किसीसे नियम के विपरीत कोई कार्य नहीं कराया. अतः उन्होंने सभी से सद्भावना तथा सम्मान पाया.

सक्रिय समाज सेवी:

प्रो. सत्यसहाय समर्पित समाज सुधारक भी थे. उन्होंने छतीसगढ़ अंचल में लड़कियों को शिक्षा से दूर रखने की कुप्रथा से आगे बढ़कर संघर्ष किया. ग्रामीण अंचल में रहकर तथा सामाजिक विरोध सहकर भी उन्होंने न केवल अपनी ४ पुत्रियों को स्नातकोत्तर शिक्षा दिलाई अपितु २ पुत्रियों को महाविद्यालयीन प्राध्यापक बनने हेतु प्रोत्साहित तथा विवाहोपरांत शोधकार्य हेतु सतत प्रेरित किया. इतना ही नहीं उन्होंने अपने संपर्क के सैंकड़ों परिवारों को भी लड़कियों को पढ़ाने की प्रेरणा दी.

स्वेच्छा से सेवानिवृत्ति के पश्चात् वे सामाजिक ऋण-की अदायगी करने में जुट गये. प्रादेशिक चित्रगुप्त महासभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जबलपुर, बरमान (नरसिंहपुर), उज्जैन, दमोह, बालाघाट, बिलासपुर आदि अनेक स्थानों पर युवक-युवती, परिचय सम्मलेन, मितव्ययी दहेज़रहित सामूहिक आदर्श विवाह सम्मलेन आदि आयोजित कराये. वैवाहिक जानकारियाँ एकत्रित कर चित्राशीष जबलपुर तथा संपर्क बिलासपुर पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने अभिभावकों को उपलब्ध कराईं.
विविध काल खण्डों में सत्यसहाय जी ने लायन तथा रोटरी क्लबों के माध्यम से भी सामाजिक सेवा की अनेक योजनाओं को क्रियान्वित कर अपूर्व सदस्यतावृद्धि हेतु श्रेष्ठ गवर्नर पदक प्राप्त किये. वे जो भी कार्य करते थे दत्तचित्त होकर लक्ष्य पाने तक करते थे.

छतीसगढ़ शासन जागे :

बिलासपुर तथा छत्तीसगढ़ के विविध अंचलों में प्रो. असत्य सहाय के निधन का समाचार पाते ही शोक व्याप्त हो गया. छतीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के अनेक महाविद्यालयों ने उनकी स्मृति में शोक प्रस्ताव पारित किये. अभियान सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्था जबलपुर, रोटरी क्राउन जबलपुर, रोटरी क्लब बिलासपुर, रोटरी क्लब खरसिया, लायंस क्लब खरसिया, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, सनातन कायस्थ महापरिवार मुम्बई, विक्रम महाविद्यालय उज्जैन, शासकीय महाकौशल महाविद्यालय जबलपुर, कायस्थ समाज बिलासपुर, कायस्थ कल्याण परिषद् बिलासपुर, कायस्थ सेना जबलपुर आदि ने प्रो. सत्यसहाय के निधन पर श्रैद्धांजलि व्यक्त करते हुए उन्हें युग निर्माता निरूपित किया है. छत्तीसगढ़ शासन से अपेक्षा है कि खरसिया महाविद्यालय में उनकी प्रतिमा स्थापित की जाये तथा रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर एवं गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर में अर्थशास्त्र विषयक उच्च शोध कार्यों हेतु प्रो. सत्यसहाय शोधपीठ की स्थापना की जाए.

दिव्यनर्मदा परिवार प्रो. सत्यसहाय के ब्रम्हलीन होने को शोक का कारण न मानते हुए इसे देह-धर्म के रूप में विधि के विधान के रूप में नत शिर स्वीकारते हुए संकल्प लेता है कि दिवंगत के आदर्शों के क्रियान्वयन हेतु सतत सक्रिय रहेगा. हिन्दी को विश्व भाषा के रूप में विकसित करने की प्रो. सत्यसहाय की मनोकामना को मूर्तरूप देने के लिये सतत प्रयास जारी रहेंगे. आप सब इस पुनी कार्य में सहयोगी हों, यही सच्ची कर्मांजलि होगी.

**********************

प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति भावांजलि:
तुममें जीवित था...
संजीव 'सलिल'
*
तुममें जीवित था इतिहास,
किन्तु न था युग को आभास...
*
पराधीनता के दिन देखे.
सत्याग्रह आन्दोलन लेखे..
प्रतिभा-पूरित सुत 'रनेह' के,
शत प्रसंग रोचक अनलेखे..
तुम दमोह के दीपक अनुपम
देते दिव्य उजास...
*
गंगा-विश्वनाथ मन भाये,
'छोटे' में विराट लख पाये..
अरपा नदी बिलासा माई-
छतीसगढ़ में रम harhsaaye..
कॉलेज-अर्थशास्त्र ने पाया-
नव उत्थान-विकास...
*
साक्ष्य खरसिया-जांजगीर है.
स्वस्थ रखी तुमने नजीर है..
व्याख्याता-प्राचार्य बहुगुणी
कीर्ति-विद्वता खुद नजीर है..
छात्र-कल्याण अधिष्ठाता रह-
हुए लोकप्रिय खास...
*
कार्यस्थों को राह दिखायी.
लायन-रोटरी ज्योति जलायी.
हिंद और हिन्दी के वाहक
अमिय लुटाया हो विषपायी..
अक्षय-निधि आशा-संबल था-
सार्थक किये प्रयास...
*
श्रम-विद्या की सतत साधना.
विमल वन्दना, पुण्य प्रार्थना,
तुम अशोक थे, तुम अनूप थे-
महावीर कर विपद सामना,
नेह-नर्मदा-सलिल पानकर-
हरी पीर-संत्रास...
*
कीर्ति-कथा मोहिनी अगेह की.
अर्थशास्त्र-शिक्षा विदेह सी.
सत-शिव-सुंदर की उपासना-
शब्दाक्षर आदित्य-गेह की..
किया निशा में भी उजियारा.
हर अज्ञान-तिमिर का त्रास...
*
संस्मरण बहुरंगी अनगिन,
क्या खोया?, क्या पाया? बिन-गिन..
गुप्त चित्त में चित्र चित्रगुप्त प्रभु!
कर्म-कथाएँ लिखें पल-छीन.
हरी उपेक्षित मन की पीड़ा
दिया विपुल अधरों को हास...
*
शिष्य बने जो मंत्री-शासन,
करें नीति से जन का पालन..
सत्ता जन-हित में प्रवृत्त हो-
दस दिश सुख दे सके सु-शासन..
विद्यानगर बसा सामाजिक
नायक लिये हुलास...
*
प्रखर कहानी कर्मयोग की,
आपद, श्रम साफल्य-योग की.
थी जिजीविषा तुममें अनुपम-
त्याग समर्पण कश्र-भोग की..
बुन्देली भू के सपूत हे!
फ़ैली सुरभि-सुवास...
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प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति गीतांजलि :

शत नमन...

*
शत नमन, हे महामानव!
शत नमन...
*
धरा से उठकर गगन पर छा गये,
स्वजन, परिजन, पुरजनों को भा गये..
कार्य में स्थित रहे कार्यस्थ हे!
काय-स्थित दैव को तुम भा गये..
हुआ है स्तब्ध यह सारा चमन...
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अमिट प्रतिभा, अजित जीवट के धनी.
बहुमुखी सामर्थ्य, थे पक्के धुनी..
विरल देखे, अब कहाँ ऐसे सु-जन?
अनुकरण युग कर सके, वैसे गुनी..
सतत उन्नति की रही तुममें लगन...
*
दिशा-दर्शक! स्वप्न कर साकार तुम.
दे सके माटी को शत आकार तुम..
संस्कारित सकल पीढ़ी को किया-
असहमत को भी रहे स्वीकार तुम.
काश हममें भी जले ऐसी अगन...
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प्रो. सत्यसहाय श्रीवास्तव के प्रति शब्द-सुमनांजलि
नमन हमारे...
संजीव 'सलिल'
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पूज्य चरण में अर्पित हैं
शत नमन हमारे...
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मन में यादों के सुगंध है,
मिला सदा आशीष.
जितना तुमने दिया, शत गुणा
तुमको दे जगदीश.
स्वागत हेतु लगे सुरपुर में
बंदनवारे....
*
तुम भास्कर, हम हुए प्रकाशित,
हैं आभारी.
बिना तुम्हारे हैं अपूर्ण हम
हे यशधारी..
यादों का पाथेय लगाये
हमें किनारे...
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नेक प्रेरणा दे अनेक को,
विदा हो गये.
खोज रहे हम, तुम विदेह में
लीन हो गये..
मन प्राणों को दीपित करते
कर्म तुम्हारे...
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प्रो सत्य सहाय श्रीवास्तव के प्रति श्रृद्धा-सुमन :
संजीव 'सलिल'
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षट्पदी
मौत ले जाती है काया, कार्य होते हैं अमर.
ज्यों की त्यों चादर राखी, निर्मल बुन्देली पूज्यवर!
हे कलम के धनी! शिक्षादान आजीवन किया-
हरा तम अज्ञानका, जब तक जला जीवन-दिया.
धरा छतीसगढ़ की ऋण से उऋण हो सकती नहीं.
'सलिल' सेवा-साधना होती अजर मिटती नहीं..
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चतुष्पदियाँ / मुक्तक
मन-किवाड़ पर दस्तक देता, सुधि का बंदनवार.
दीप जलाये स्मृतियों के, झिलमिल जग उजियार.
इस जग से तुम चले गये, मन से कैसे जाओगे?
धूप-छाँव में, सुख-दुःख में, सच याद बहुत आओगे..
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नहीं किताबी शिक्षक थे तुम, गुरुवत बाँटा ज्ञान.
शत कंकर तराशकर शंकर, गढ़े बिना अभिमान..
जीवन गीता, अनुभव रामायण के अनुपम पाठ-
श्वास-श्वास तुम रहे पढ़ाते, बन रस-निधि, रस-खान..
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सफल उसी का जीवन, जिसका होता सत्य-सहाय.
सत्य सहाय न हो पाये तो मानव हो निरुपाय..
जो होता निरुपाय उसीका जीवन निष्फल जान-
स्वप्न किये साकार अनेकों के, रच नव अध्याय..
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पुण्य फले तब ही जुड़ पाया, तुमसे स्नेहिल नाता.
तुममें वाचिक परंपरा को, मूर्तित होते पाया..
जटिल शुष्क नीरस विषयों को सरस बना समझाते-
दोष-हरण सद्गुण-प्रसार के थे अनुपम व्याख्याता..
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तुम गये तो शून्य सा मन हो गया है.
है जगत में किन्तु लगता खो गया है..
कभी लगता आँख में आँसू नहीं हैं-
कभी लगता व्यथित हो मन रो गया है..
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याद तुम्हारी गीत बन रही,
जीवन की नव रीत बन रही.
हार मान हर हार ग्रहण की-
श्वास-आस अब जीत बन रही..
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अश्रुधारा से तुम्हें तर्पण करेंगे.
हृदय के उद्गार शत अर्पण करेंगे..
आत्म पर जब भी 'सलिल' संदेह होगा-
सुधि तुम्हारी कसौटी-दर्पण करेंगे..
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तुम थे तो घर-घर लगता था.
हर कण अपनापन पगता था..
पारस परस तुम्हारा पाकर-
सोया अंतर्मन जगता था..
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सुधियों के दोहे
सत्य सहाय सदा रहे, दो आशा-सहकार.
शांति-राज पुष्पा सके, सुषमा-कृष्ण निहार..
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कीर्ति-किरण हनुमान की, दीप्ति इंद्र शशि सोम.
चन्द्र इंदु सत्य सुधा, माया-मुकुलित ॐ..
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जब भी जीवन मिले कर सफल साधना हाथ.
सत-शिव सुंदर रचें पा, सत-चित-आनंद नाथ..
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सत्य-यज्ञ में हो सके, जीवन समिधा दैव.
औरों का कुछ भलाकर, सार्थक बने सदैव..
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कदम-कदम संघर्ष कर, सके लक्ष्य को जीत.
पूज्यपाद वर दीजिये, 'सलिल'-शत्रु हो मीत..
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महाकाल से भी किये, बरसों दो-दो हाथ.
निज इच्छा से भू तजी, गह सुरपुर का पाथ..
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लखी राम ने भी 'सलिल', कब आओ तुम, राह.
हमें दुखीकर तुम गये, पूरी करने चाह..
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शिरोधार्य रह मौन हम, विधि का करें विधान.
दिल रोये, चुप हों नयन, अधर करें यश-गान..
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सद्गुरु बिन सुर कर नहीं, पाये 'सलिल' निभाव.
बिन आवेदन चुन लिया, तुमको- मिटे अभाव..
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देह जलाने ले गये, वे जिनसे था नेह.
जिन्हें दिखाया गेह था, करते वही-गेह..
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आकुल-व्याकुल तन हुआ, मन है बहुत उदास.
सुरसरि को दीं अस्थियाँ, सुधियाँ अपने पास..
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आदम की औकात है, बस मुट्ठी भर राख.
पार गगन को भी करे, तुम जैसों की साख..
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नयन मूँदते ही दिखे, झलक तुम्हारी नित्य.
आँख खुले तो चतुर्दिक, मिलता जगत अनित्य..
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कविता:
विरसा
संजीव 'सलिल'
*
तुमने
विरसे में छोड़ी है
अकथ-कथा
संघर्ष-त्याग की.
हमने
जीवन-यात्रा देखी
जीवट-श्रम,
बलिदान-आग की.
आये थे अनजान बटोही
बहुतों के
श्रृद्धा भाजन हो.
शिक्षा, ज्ञान, कर्म को अर्पित
तुम सारस्वत नीराजन हो.
हम करते संकल्प
कर्म की यह मशाल
बुझ ना पायेगी.
मिली प्रेरणा
तुमसे जिसको
वह पीढ़ी जय-जय गायेगी.
प्राण-दीप जल दे उजियारा
जग ज्योतित कर
तिमिर हरेगा.
सत्य सहाय जिसे हो
वह भी-
तरह तुम्हारी लक्ष्य वरेगा.
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प्रो. सत्यसहाय के प्रति :
स्मृति गीत:
मन न मानता...
संजीव 'सलिल'
*
मन न मानता
चले गये हो...
*
अभी-अभी तो यहीं कहीं थे.
आँख खुली तो कहीं नहीं थे..
अंतर्मन कहता है खुदसे-
साँस-आस से
छले गये हो...
*
नेह-नर्मदा की धारा थे.
श्रम-संयम का जयकारा थे..
भावी पीढ़ी के नयनों में-
स्वप्न सदृश तुम
पले गये हो...
*
दुर्बल तन में स्वस्थ-सुदृढ़ मन.
तुम दृढ़ संकल्पों के गुंजन..
जीवन उपवन में भ्रमरों संग-
सूर्य अस्त लाख़
ढले गये हो...
*****