menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

शनिवार, 7 जून 2014

rashtreey kayasth mahaparishad sammelan cuttack 6-7-2014

ॐ 
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद 
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओं/सज्जनों का परिसंघ, पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवास, पड़ाव पोखरलेन, आमगोला, मुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३, ०६२१-२२४३९९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा'सलिल', २०४ , विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाउन, जबलपुर, ४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ , ०७६१ २४१११३१, salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१, ब्लोक ६, मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५, ०६१२ २६८४४४४, arbindsinha@yahoo.com 
।  कायास्थित ईश का, अंश हुआ कायस्थ ।
।। सब सबके सहयोग से, हों उन्नत आत्मस्थ ।।
================
पत्र क्रमांक: ४८५ महा/राकाम/२०१४                   जबलपुर, दिनाँक:​ ७-६-२०१४ 
            राष्ट्रीय कायस्थ महासभा अर्धवार्षिक सम्मेलन : २०१३-१४ : अधिसूचना
. दिनांक: ५-६ जुलाई २०१४,   स्थान:श्री रामचन्द्र भवन, म्युनिसिपैल्टी कॉम्प्लेक्स,कटक।
संयोजक:प्रो. डॉ. नीलमणि दास, उपाध्यक्ष रा.का.म., चलभाष:०९४३७३१३६६७, ई मेल: Nilamani Das
कार्यक्रम विवरण : दिनांक : ५ - ७- २०१४
(अ)  कार्यकारिणी/संगठन समिति समिति बैठक  : अपरान्ह ४.०० बजे से संध्या ६.०० बजे । 
[संविधान कंडिका १२  के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष, संगठन सचिव, संयुक्त संगठन सचिव, मुख्य समन्वयक, संयोजक, प्रकोष्ठ प्रभारी आदि समस्त पदाधिकारी तथा सम्बद्ध संस्था प्रतिनिधि।]
कार्यवाही : सञ्चालन महामंत्री द्वारा, सहायक : संगठन सचिव, कोषाध्यक्ष  
कार्यावलि: १. देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त अर्चना।
२. गत सञ्चालन समिति/संगठन समिति/सामान्य समिति बैठकों के प्रतिवेदनों तथा पदाधिकारियों के लिखित प्रतिवेदनों पर विचार। 
३. आय-व्यय विवरण पारित किया जाना। 
४. बजट प्रस्तावों पर विचार  / अनुशंसा।
५. सञ्चालन समिति बैठक हेतु प्राप्त लिखित प्रतिवेदनों प्रस्तावों/सुझावों/कार्यक्रमों/आमंत्रणों/आवेदनों/सम्मान प्रस्तावों पर विचार व अनुशंसा। आगामी त्रिमास हेतु लक्ष्य निर्धारण।   
६. अन्य विषय अध्यक्ष की अनुमति से। 
७. महामंत्री/अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन व समापन।
संध्या ६ बजे: स्वल्पाहार-चाय।
(आ)  सञ्चालन समिति बैठक  : अपरान्ह ६.३० बजे से रात्रि ८.०० बजे । 
[संविधान कंडिका ९-११ के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष, संगठन सचिव, संयुक्त संगठन सचिव, समन्वयक, कार्यकारी सदस्य] 
 कार्यवाही सञ्चालन महामंत्री द्वारा, सहायक: मुख्यालय सचिव, कार्यालय सचिव, कोषाध्यक्ष      
: कार्यावलि :
१. देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त वंदना ।
२. गत सञ्चालन समिति बैठक के कार्यवाही प्रतिवेदन, सञ्चालन समिति सदस्यों / पदाधिकारियों (संगठन सचिव, कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष,  कार्यालय सचिव, मुख्यालय सचिव आदि) के प्रतिवेदनों, कार्यकारिणी समिति की लिखित अनुशंसाओं, प्राप्त लिखित अवदानों पर विचार व निर्णय ।
३. सामान्य सम्मेलन में पारित कराने हेतु वार्षिक बजट को अन्तिम रूप देना। 
४. पंजीयक को प्रेषित करने हेतु संचालन समिति का अनुमोदन।
५. आगामी सम्मेलनों, बैठकों व प्रतिभा-सम्मान हेतु प्राप्त लिखित प्रस्तावों पर निर्णय। 
६.  सामान्य सभा हेतु प्रतिवेदनों, प्रस्तावों, कार्यक्रमों, प्रमाणपत्रों आदि का अनुमोदन।
७. महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन व समापन।
रात्रि ८ बजे: साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम।       रात्रि ९.३० बजे: अतिथि भोज।
दिनांक : ६ - ७- २०१४
(अ)  प्रातः ८ बजे: स्वल्पाहार, चाय ।
(आ) सामान्य सम्मेलन: प्रातः ९ बजे से ४ बजे 
संविधान कंडिका १२ के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : संस्था के समस्त पदाधिकारी व सदस्य, सम्बद्ध संस्थापदाधिकारी/सदस्य, समाज के सभी सदस्य व अन्य समाजों के कायस्थ मित्र.
(क) स्वागत / परिचय सत्र: सञ्चालन सचिव स्वागत समिति द्वारा 
१. ध्वजारोहण तथा देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त पूजन, आरती ।
२. संयोजक द्वारा अतिथि/ पदाधिकारी स्वागत व स्वागत भाषण, आयोजन पर प्रकाश। 
३. अतिथि / राष्ट्रीय पदाधिकारी परिचय । 
४. सम्बद्ध तथा स्थानीय संस्था प्रतिनिधि परिचय। 
५. उपस्थितों द्वारा आत्म परिचय । 
६.  महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन।  
७. अतिथियों का सम्बोधन तथा संयोजक द्वारा आभार।
(ख) कार्यवाही सत्र: सञ्चालन महामंत्री द्वारा
१. महामंत्री द्वारा सत्र प्रक्रिया की जानकारी।
२. महापरिषद का लेखा-जोखा, वार्षिक बजट, नियुक्तियाँ, बैठक प्रतिवेदनों को पारित करना।
३. उपस्थित सदस्यों से प्राप्त लिखित प्रतिवेदनों / सुझावों आदि पर विचार व निर्णय।
३.  स्थानीय संस्थाओं, आयोजनों, समस्याओं पर चर्चा व निर्णय। 
४.  परिचर्चा: '२१ वीं सदी में जातिगत आरक्षण और कायस्थ समाज। 
५.  महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन ।
अपरान्ह १.०० बजे: बिरादरी भोज।
(ग) समापन सत्र: अपरान्ह २.०० बजे: सञ्चालन संयोजक द्वारा
१. अतिथि आमंत्रण।                        २. प्रतिभा पुरस्कार / सम्मान।
३. अतिथियों का सम्बोधन।                ४. अतिथियों द्वारा आयोजकों के प्रति आभार। 
५. संयोजक द्वारा अतिथियों के प्रति आभार व समापन।
​salil.sanjiv@gmail.com                                                                                  ​
​http://divyanarmada.blogspot.in                                               संजीव वर्मा 'सलिल'
​facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'                                       महामंत्री 

शुक्रवार, 6 जून 2014

chhand salila: geeta chhand -sanjiv

छंद सलिला:

गीता Roseछंद 

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद - मात्रा २६ मात्रा, यति १४ - १२, पदांत गुरु लघु.

लक्षण छंद:

    चौदह भुवन विख्यात है , कुरु क्षेत्र गीता-ज्ञान
    आदित्य बारह मास नित , निष्काम करे विहान  
    अर्जुन सदृश जो करेगा , हरी पर अटल विश्वास  
    गुरु-लघु न व्यापे अंत हो , हरि-हस्त का आभास    
     संकेत: आदित्य = बारह 
उदाहरण:

१. जीवन भवन की नीव है , विश्वास- श्रम दीवार
   दृढ़ छत लगन की डालिये , रख हौसलों का द्वार   
   ख्वाबों की रखें खिड़कियाँ , नव कोशिशों का फर्श   
   सहयोग की हो छपाई , चिर उमंगों का अर्श 

२. अपने वतन में हो रहा , परदेश का आभास         
    अपनी विरासत खो रहे , किंचित नहीं अहसास
    होटल अधिक क्यों भा रहा? , घर से हुई क्यों ऊब?
    सोचिए! बदलाव करिए , सुहाये घर फिर खूब 

३. है क्या नियति के गर्भ में , यह कौन सकता बोल?
    काल पृष्ठों पर लिखा क्या , कब कौन सकता तौल?
    भाग्य में किसके बदा क्या , पढ़ कौन पाया खोल?
    कर नियति की अवमानना , चुप झेल अब भूडोल।

४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
    है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
    है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
    है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध   
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शुक्रवार, 30 मई 2014

lekh: kundli milan men gan vichar sanjiv

लेख: 
कुंडली मिलान में गण-विचार
संजीव 
*








वैवाहिक संबंध की चर्चा होने पर लड़का-लड़की की कुंडली मिलान की परंपरा भारत में है. कुंडली में वर्ण का १, वश्य के २, तारा के ३, योनि के ४, गृह मैटरर के ५, गण के ६, भकूट के ७ तथा नाड़ी के ८ कुल ३६ गुण होते हैं.जितने अधिक गुण मिलें विवाह उतना अधिक सुखद माना जाता है. इसके अतिरिक्त मंगल दोष का भी  विचार किया जाता है. 

कुंडली मिलान में 'गण' के ६ अंक होते हैं. गण से आशय मन:स्थिति या मिजाज (टेम्परामेन्ट) के तालमेल से हैं. गण अनुकूल हो तो दोनों में उत्तम सामंजस्य और समन्वय उत्तम होने तथा गण न मिले तो शेष सब अनुकूल होने पर भी अकारण वैचारिक टकराव और मानसिक क्लेश होने की आशंका की जाती है. दैनंदिन जीवन में छोटी-छोटी बातों में हर समय एक-दूसरे की सहमति लेना या एक-दूसरे से सहमत होना संभव नहीं होता,  दूसरे को सहजता से न ले सके और टकराव हो तो पूरे परिवार की मानसिक शांति नष्ट होती है। गण भावी पति-पत्नी के वैचारिक साम्य और सहिष्णुता को इंगित करते हैं। 

ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थ कल्पद्रुम के अनुसार निम्न २ स्थितियों में गण दोष को महत्त्वहीन कहा गया है:

१. 'रक्षो गणः पुमान स्याचेत्कान्या भवन्ति मानवी । केपिछान्ति तदोद्वाहम व्यस्तम कोपोह नेछति ।।' 

अर्थात जब जातक का कृतिका, रोहिणी, स्वाति, मघा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढा नक्षत्रों में जन्म हुआ हो।

        २. 'कृतिका रोहिणी स्वामी मघा चोत्त्राफल्गुनी । पूर्वाषाढेत्तराषाढे न क्वचिद गुण दोषः ।।'

अर्थात जब वर-कन्या के राशि स्वामियों अथवा नवांश के स्वामियों में मैत्री हो।

      गण को ३ वर्गों 1-देवगण, 2-नर गण, 3-राक्षस गण में बाँटा गया है। गण मिलान ३ स्थितियाँ हो सकती हैं:

1. वर-कन्या दोनों समान गण के हों तो सामंजस्य व समन्वय उत्तम होता है. 

2. वर-कन्या देव-नर हों तो सामंजस्य संतोषप्रद होता है ।

३. वर-कन्या देव-राक्षस हो तो सामंजस्य न्यून होने के कारण पारस्परिक टकराव होता है ।

शारंगीय के अनुसार; वर राक्षस गण का और कन्या मनुष्य गण की हो तो विवाह उचित होगा। इसके विपरीत वर मनुष्य गण का एवं कन्या राक्षस गण की हो तो विवाह उचित नहीं अर्थात सामंजस्य नहीं होगा। 

सर्व विदित है कि देव सद्गुणी किन्तु विलासी, नर या मानव परिश्रमी तथा संयमी एवं असुर या राक्षस दुर्गुणी, क्रोधी तथा अपनी इच्छा अन्यों पर थोपनेवाले होते हैं।  

भारत में सामान्यतः पुरुषप्रधान परिवार हैं अर्थात पत्नी सामान्यतः पति की अनुगामिनी होती है। युवा अपनी पसंद से विवाह करें या अभिभावक तय करें दोनों स्थितियों में वर-वधु के जीवन के सभी पहलू एक दूसरे को विदित नहीं हो पाते। गण मिलान अज्ञात पहलुओं का संकेत कर सकता है। गण को कब-कितना महत्त्व देना है यह उक्त दोनों तथ्यों तथा वर-वधु के स्वभाव, गुणों, शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में विचारकर तय करना चाहिए। 

गुरुवार, 29 मई 2014

haiku: sanjiv

हाइकु सलिला: 

संजीव 
*
कमल खिला
संसद मंदिर में
पंजे को गिला   
*
हट गयी है 
संसद से कैक्टस
तुलसी लगी
* 
नरेंद्र नाम 
गूँजा था, गूँज रहा 
अमरीका में 
*
मिटा कहानी 
माँ और बेटे लिखें 
नयी कहानी 
 * 
नहीं हैं साथ 
वर्षों से पति-पत्नी 
फिर भी साथ 
*

रविवार, 18 मई 2014

nari vimarsh

​

सोचिए, क्या औरतें गैर इस्लामिक और मर्दों की गुलाम मात्र हैं?

इस्लामाबाद। द कौंसिल ऑफ़ इस्लामिक आइडिओलॉजी The Council of Islamic Ideology (CII) की १९२ वीं बैठक के निर्णय अनुसार ' औरतों का अस्तित्व शरीया तथा अल्लाह की इच्छा के विपरीत है. कौंसिल के चेयरमैन मौलाना मुहम्मद खान शीरानी ने कहा कि औरतों का होना प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है तथा औरतों से इस्लाम और शरीया की रक्षा लिए औरतों को निजी अस्तित्व न रखने के लिए बाध्य किया जाए. मुस्लिम औरतों की शादी के लिए न्यूनतम आयु निर्धारण को इस्लामविरोधी घोषित के २ दिन बाद यह घोषणा की गयी. शीरानी ने औरतों को इस्लाम विरोधी घाषित करते हुए  कहा कि औरतें दो प्रकार की हराम  (निषिद्ध) तथा मकरूह (नापसंद) होती हैं. कोई भी औरत जो अपनी इच्छा अनुसार कार्य करती है हराम तथा इस्लाम के विरुद्ध षड्यंत्रकर्त्री है.  केवल पूरी तरह आज्ञापालक औरत खुद को मकरूह के स्तर तक उठा सकती है, यही इस्लाम की उदारता तथा मुस्लिम पुरुष की कोशिश है. कौंसिल सदस्यों ने औरतों से जुड़े कर ऐतिहासिक सन्दर्भों विचार के बाद पाया की हर औरत फ़ित्ना का  इस्लाम की दुश्मन है. उन्होंने यह निर्णय भी लिया कि मोमिन तथा मुजाहिदीन औरतों को दास होने तक रोककर  की इस्लाम शांति, समृद्धि तथा लैंगिक समानता का धर्म बना रहे. एक प्रतिनिधि ने कहा की औरतों  सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय मानक इस्लाम या पाकिस्तान के संविधान जिसमें अल्लाह को सर्वोच्चता दे गयी है के विरोधी हों तो उन्हें नहीं माना जाना चाहिए। कौंसिल ने सरकार को सलाह दी की औरतों से श्वास लेने का अधिकार छीनकर उसके पति या पालक को दिया जाना चाहिए। औरत को किसी भी हालत में श्वास लेने या न लेने का निर्णय करने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए।

Islamabad - Sharia Correspondent: The Council of Islamic Ideology (CII) concluded their 192nd meeting on Thursday with the ruling that women are un-Islamic and that their mere existence contradicted Sharia and the will of Allah. As the meeting concluded CII Chairman Maulana Muhammad Khan Shirani noted that women by existing defied the laws of nature, and to protect Islam and the Sharia women should be forced to stop existing as soon as possible. The announcement comes a couple of days after CII’s 191st meeting where they dubbed laws related to minimum marriage age to be un-Islamic.

After declaring women to be un-Islamic, Shirani explained that there were actually two kinds of women – haraam and makrooh. “We can divide all women in the world into two distinct categories: those who are haraam and those who are makrooh. Now the difference between haraam and makrooh is that the former is categorically forbidden while the latter is really really disliked,” Shirani said.

He further went on to explain how the women around the world can ensure that they get promoted to being makrooh, from just being downright haraam. “Any woman that exercises her will is haraam, absolutely haraam, and is conspiring against Islam and the Ummah, whereas those women who are totally subservient can reach the status of being makrooh. Such is the generosity of our ideology and such is the endeavour of Muslim men like us who are the true torchbearers of gender equality,” the CII chairman added.

Officials told Khabaristan Today that the council members deliberated over various historic references related to women and concluded that each woman is a source of fitna and a perpetual enemy of Islam. They also decided that by restricting them to their subordinate, bordering on slave status, the momineen and the mujahideen can ensure that Islam continues to be the religion of peace, prosperity and gender equality.

Responding to a question one of the officials said that international standards of gender equality should not be used if they contradict Islam or the constitution of Pakistan that had incorporated Islam and had given sovereignty to Allah. “We don’t believe in western ideals, and nothing that contradicts Islam should ever be paid heed. In any case by giving women the higher status of being makrooh, it’s us Muslims who have paved the way for true, Sharia compliant feminism,” the official said.

The CII meeting also advised the government that to protect Islam women’s right to breathe should also be taken away from them. “Whether a woman is allowed to breathe or not be left up to her husband or male guardian, and no woman under any circumstance whatsoever should be allowed to decide whether she can breathe or not,” Shirani said.

गुरुवार, 15 मई 2014

chhand salila: kavya chhand -sanjiv

सन्देश; हिंदी पर गर्व करें

सन्देश; हिंदी पर गर्व करें, न बोल सकें तो शर्म

ॐ
छंद सलिला:   ​​​

काव्य छंद ​

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति अवतारी, प्रति चरण मात्रा २४ मात्रा, यति ग्यारह-तेरह, मात्रा बाँट ६+४+४+४+६, हर चरण में ग्यारहवीं मात्रा लघु

लक्षण छंद:
   काव्य छंद / चौबी/स, कला / ग्यारह/-तेरह हो
   रखें कला / लघु रू/द्र, षट क/ली आ/दि-अंत हो 
   मध्य चतुष्/कल ती/न, द्विमा/ता क/र्मदेव वत 
   अवतारी / की सुं/द,र छवि / लख शं/का कर मत  
(संकेत: रूद्र = ग्यारह, द्विमाता कर्मदेव = नंदिनी-इरावती तथा चित्रगुप्त)  

उदाहरण:  १. चमक-दमक/कर दिल / दहला/ती बिज/ली गिरकर
   दादुर ना/चे उछ/ल-कूद/कर, मट/क-मटककर
   सनन-सनन / सन पव/न खेल/ता मच/ल-मचलकर
   ढाँक सूर्य / को मे/घ अकड़/ता गर/ज-गरजकर      

२. अमन-चैन / की है / तलाश / दुनिया / में सबको
    फिर भी झग/ड़े-झं/झट घे/रे हैं / जन-जन को
    लोभ--मोह / माया-/ममता / बेढब / चक्कर है

    हर युग में /परमा/र्थ-स्वार्थ / की ही /टक्कर है 

   ३. मस्जिद-मं/दिर ध/र्म-कर्म / का म/र्म न समझे 
    रीति-रिवा/ज़ों में / रहते / हैं हर/दम उलझे
    सेवा भू/ले पथ / इनको / मेवा / का रुचता
    लालच ने / मोहा,/ तिल भर / भी त्या/ग न दिखता                    
                              *********

(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, राजीव, राधिका, रामा, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सुखदा, सुगति, सुजान, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शुक्रवार, 9 मई 2014

geet- rakesh khandelwal-sanjiv

गीत-प्रतिगीत 

राकेश खंडेलवाल - संजीव  *
जहाँ फ़िसलते हुए बचे थे पाँव  उम्र के उन मोड़ों पर
जमी हुई परतों में से अब प्रतिबिम्बित होती परछाईं
जहाँ मचलते गुलमोहर ने एक दिवस अनुरागी होकर
सौंपी थी प्राची को अपने संचय की पूरी अरुणाई

उसी मोड़ से गये समेटे कुछ अनचीन्हे से भावों को

मैं अपनी एकाकी संध्याओं में नित टाँका करता हूँ
*

अग्निलपट सिन्दूर चूनरी, मंत्र और कदली स्तंभों ने
जिस समवेत व्यूह रचना के नये नियम के खाके खींचे
उससे जनित कौशलों के अनुभव ने पथ को चिह्नित कर कर
जहाँ जहाँ विश्रान्ति रुकी थी वहीं वहीं पर संचय सींचे

निर्निमेष हो वही निमिष अब ताका करते मुझे निरन्तर

और खोजने उनमें उत्तर मैं उनको ताका करता हूँ

षोडस सोमवार के व्रत ने दिये पालकी को सोलह पग

था तुलसी चौरे का पूजन ,गौरी मन्दिर का आराधन
खिंची हाथ की रेखाओंका लिखा हुआ था घटित वहाँ पर
जबकि चुनरिया पर, आंखों में आ आ कर उतरा था सावन

हो तो गया जिसे होना था, संभव नहीं, नहीं हो पाता

उस अतीत के वातायन में, मैं अब भी झाँका करता हूँ

तय कर चुका अकल्पित दूरी कालचक्र भी चलते चलते

जहाँ आ गया पीछे का कुछ दृश्य नहीं पड़ता दिखलाई
फ़िर भी असन्तुष्ट इस मन की ज़िद है वापिस लौटें कुछ पल
वहाँ, जहाँ पर धानी कोई किरण एक पल थी लहराई

इस स्थल से अब उस अमराई की राहों को समय पी गया

मैं फ़िर भी तलाश थामे पथ की सिकता फ़ाँका करता हूँ
____________
गीत
*
अटल सत्य गत-आगत फिसलन-मोड़ मिलाएंगे फ़िर हमको


किसके नयनों में छवि किसकी कौन बताये रही समाई   
वहीं सृजन की रची पटकथा  विधना ने चुपचाप हुलसकर
संचय अगणित गणित हुआ ज्यों ध्वनि ने प्रतिध्वनि थी लौटाई

मौन मगन हो सतनारायण के प्रसाद में मिली पँजीरी
अँजुरी में ले बुक्का भर हो आनंदित फाँका करता हूँ
*
खुदको तुममें गया खोजने जब तब पाया खुदमेँ तुमको
किसे ज्ञात कब तुम-मैं हम हो सिहर रहे थे अँखियाँ मीचे
बने सहारा जब चाहा तब अहम सहारा पा नतमस्तक
हुआ और भर लिया बाँह में खुदको खुदने उठ-झुक नीचे

हो अवाक मन देख रहा था कैसे शून्य सृष्टि रचता है
हार स्वयं से, जीत स्वयं को नव सपने आँका करता हूँ
*
चमका शुक्र हथेली पर हल्दी आकर चुप हुई विराजित
पुरवैया-पछुआ ने बन्ना-बन्नी गीत सुनाये भावन
गुण छत्तीस मिले थे उस पल, जिस पल पलभर नयन मिले थे
नेह नर्मदा छोड़ मिली थी, नेह नर्मदा मन के आँगन 
 
पाकर खोना, खोकर पाना निमिष मात्र में जान मनीषा
मौन हुई, विश्वास सितारे मन नभ पर टाँका करता हूँ
*
आस साधना की उपासना करते उषा हुई है संध्या
रजनी में दोपहरी देखे चाहत, राहत हुई पराई
मृगमरीचिका को अनुरागा, दौड़ थका तो भुला विकलता
मन देहरी सँतोष अल्पना की कर दी हँसकर कुड़माई

सुधियों के दर्पण में तुझको, निरखा थकन हुई छूमंतर
कलकल करती 'सलिल'-लहर में, छवि तेरी झाँका करता हूँ
*

गुरुवार, 8 मई 2014

puja geet: ravindra nath thakur

बाङ्ग्ला-हिंदी भाषा सेतु:

पूजा गीत

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

*

जीवन जखन छिल फूलेर मतो

पापडि ताहार छिल शत शत।

बसन्ते से हत जखन दाता

रिए दित दु-चारटि  तार पाता,

तबउ जे तार बाकि रइत कत

आज बुझि तार फल धरेछे,

ताइ हाते ताहार अधिक किछु नाइ।

हेमन्ते तार समय हल एबे

पूर्ण करे आपनाके से देबे

रसेर भारे ताइ से अवनत। 

*

पूजा गीत:  रवीन्द्रनाथ ठाकुर

हिंदी काव्यानुवाद : संजीव 

* 

फूलों सा खिलता जब जीवन

पंखुरियां सौ-सौ झरतीं।

यह बसंत भी बनकर दाता 

रहा झराता कुछ पत्ती।

संभवतः वह आज फला है 

इसीलिये खाली हैं हाथ।

अपना सब रस करो निछावर

हे हेमंत! झुककर माथ।

*

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

doha salila: sanjiv

चित्र पर कविता:
संजीव
*
 
*
अगम अनाहद नाद हीं, सकल सृष्टि का मूल
व्यक्त करें लिख ॐ हम, सत्य कभी मत भूल
 
निराकार ओंकार का, चित्र न कोई एक
चित्र गुप्त कहते जिसे, उसकाचित्र हरेक
 
सृष्टि रचे परब्रम्ह वह, पाले विष्णु हरीश
नष्ट करे शिव बन 'सलिल', कहते सदा मनीष

कंकर-कंकर में रमा, शंका का  कर अन्त
अमृत-विष धारण करे, सत-शिव-सुन्दर संत
 
महाकाल के संग हैं, गौरी अमृत-कुण्ड
सलिल प्रवाहित शीश से, देखेँ चुप ग़ज़-तुण्ड
 
विष-अणु से जीवाणु को, रचते विष्णु हमेश
श्री अर्जित कर रम रहें, श्रीपति सुखी विशेष
 
ब्रम्ह-शारदा लीन हो, रचते सुर धुन ताल
अक्षर-शब्द सरस रचें, कण-कण देता ताल
 
नाद तरंगें संघनित, टकरातीं होँ एक
कण से नव कण उपजते, होता एक अनेक
 
गुप्त चित्र साकार हो, निराकार से सत्य
हर आकार विलीन हो, निराकार में नित्य
 
आना-जाना सभी को, यथा समय सच मान
कोई न रहता हमेशा, परम सत्य यह जान
 
नील गगन से जल गिरे, बहे समुद मेँ लीन
जैसे वैसे जीव हो, प्रभु से प्रगट-विलीन
 
कलकल नाद सतत सुनो, छिपा इसी में छंद
कलरव-गर्जन चुप सुनो, मिले गहन आनंद
 
बीज बने आनंद ही, जीवन का है सत्य
जल थल पर गिर जीव को, प्रगटाता शुभ कृत्य
 
कर्म करे फल भोग कर, जाता खाली हाथ
शेष कर्म फल भोगने, फ़िर आता नत माथ
 
सत्य समझ मत जोड़िये, धन-सम्पद बेकार
आये कर उपयोग दें, ओरों को कर प्यार
 
सलिला कब जोड़ें सलिल, कभी न रीते देख
भर-खाली हो फ़िर भरे, यह विधना का लेख

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

shiv tandav stotra: sanuvad -sanjiv

रावण रचित शिवताण्डवस्तोत्रम् :
हिन्दी काव्यानुवाद तथा अर्थ - संजीव 'सलिल'
*

 https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi39LuHAaqJuxrqOOcKmUWk2CjcnxJpyNGUhhVAyDMpakjvM-qqWgCEGsb1JbaEHANbLxoxZCu5cKBVEtPUzHCpITfCp2DDmm2esWlAr50etTyCImRH7vupg_XkkLoNgF0_mShbhmsmu2w/s1600/hpshivapl.jpg

श्री गणेश विघ्नेश शिवा-शव नंदन-वंदन.
लिपि-लेखनि, अक्षरदाता कर्मेश शत नमन..
नाद-ताल,स्वर-गान अधिष्ठात्री माँ शारद-
करें कृपा नित मातु नर्मदा जन-मन-भावन..
*
प्रात स्नान कर, श्वेत वसन धरें कुश-आसन.
मौन करें शिवलिंग, यंत्र, विग्रह का पूजन..
'ॐ नमः शिवाय' जपें रुद्राक्ष माल ले-
बार एक सौ आठ करें, स्तोत्र का पठन..
भाँग, धतूरा, धूप, दीप, फल, अक्षत, चंदन,
बेलपत्र, कुंकुम, कपूर से हो शिव-अर्चन..
उमा-उमेश करें पूरी हर मनोकामना-
'सलिल'-साधन सफल करें प्रभु, निर्मल कर मन..
*
: रावण रचित शिवताण्डवस्तोत्रम् :
हिन्दी काव्यानुवाद तथा अर्थ - संजीव 'सलिल'
श्रीगणेशाय नमः
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् || १||

सघन जटा-वन-प्रवहित गंग-सलिल प्रक्षालित.
पावन कंठ कराल काल नागों से रक्षित..
डम-डम, डिम-डिम, डम-डम, डमरू का निनादकर-
तांडवरत शिव वर दें, हों प्रसन्न, कर मम हित..१..

सघन जटामंडलरूपी वनसे प्रवहित हो रही गंगाजल की धाराएँ जिन शिवजी के पवित्र कंठ को प्रक्षालित करती (धोती) हैं, जिनके गले में लंबे-लंबे, विक्राक सर्पों की मालाएँ सुशोभित हैं, जो डमरू को डम-डम बजाकर प्रचंड तांडव नृत्य कर रहे हैं-वे शिवजी मेरा कल्याण करें.१.
*

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि |
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम|| २||

सुर-सलिला की चंचल लहरें, हहर-हहरकर,
करें विलास जटा में शिव की भटक-घहरकर.
प्रलय-अग्नि सी ज्वाल प्रचंड धधक मस्तक में,
हो शिशु शशि-भूषित शशीश से प्रेम अनश्वर.. २

जटाओं के गहन कटावों में भटककर अति वेग से विलासपूर्वक भ्रमण करती हुई देवनदी गंगाजी की लहरें जिन शिवजी के मस्तक पा र्लाहरा रहे एहेन, जिनके मस्तक में अग्नि की प्रचंड ज्वालायें धधक-धधककर प्रज्वलित हो रही हैं, ऐसे- बाल-चन्द्रमा से विभूषित मस्तकवाले शिवजी में मेरा अनुराग प्रतिपल बढ़ता रहे.२.

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे |
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि || ३||

पर्वतेश-तनया-विलास से परमानन्दित,
संकट हर भक्तों को मुक्त करें जग-वन्दित!
वसन दिशाओं के धारे हे देव दिगंबर!!
तव आराधन कर मम चित्त रहे आनंदित..३..

पर्वतराज-सुता पार्वती के विलासमय रमणीय कटाक्षों से परमानन्दित (शिव), जिनकी कृपादृष्टि से भक्तजनों की बड़ी से बड़ी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं, दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, उन शिवजी की आराधना में मेरा चित्त कब आनंदित होगा?.३.
*
लताभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे |
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदमद्भुतं बिभर्तुभूतभर्तरि || ४||

केशालिंगित सर्पफणों के मणि-प्रकाश की,
पीताभा केसरी सुशोभा दिग्वधु-मुख की.
लख मतवाले सिन्धु सदृश मदांध गज दानव-
चरम-विभूषित प्रभु पूजे, मन हो आनंदी..४..

जटाओं से लिपटे विषधरों के फण की मणियों के पीले प्रकाशमंडल की केसर-सदृश्य कांति (प्रकाश) से चमकते दिशारूपी वधुओं के मुखमंडल की शोभा निरखकर मतवाले हुए सागर की तरह मदांध गजासुर के चरमरूपी वस्त्र से सुशोभित, जगरक्षक शिवजी में रामकर मेरे मन को अद्भुत आनंद (सुख) प्राप्त हो.४.
*
ललाटचत्वरज्वलद्धनंजस्फुल्लिंगया, निपीतपंचसायकं नमन्निलिम्पनायकं |
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं, महाकलपालिसंपदे सरिज्जटालमस्तुनः ||५||

ज्वाला से ललाट की, काम भस्मकर पलमें,
इन्द्रादिक देवों का गर्व चूर्णकर क्षण में.
अमियकिरण-शशिकांति, गंग-भूषित शिवशंकर,
तेजरूप नरमुंडसिंगारी प्रभु संपत्ति दें..५..

अपने विशाल मस्तक की प्रचंड अग्नि की ज्वाला से कामदेव को भस्मकर इंद्र आदि देवताओं का गर्व चूर करनेवाले, अमृत-किरणमय चन्द्र-कांति तथा गंगाजी से सुशोभित जटावाले नरमुंडधारी तेजस्वी शिवजी हमें अक्षय संपत्ति प्रदान करें.५.
*
सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः |
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ||६||

सहसनयन देवेश-देव-मस्तक पर शोभित,
सुमनराशि की धूलि सुगन्धित दिव्य धूसरित.
पादपृष्ठमयनाग, जटाहार बन भूषित-
अक्षय-अटल सम्पदा दें प्रभु शेखर-सोहित..६..

इंद्र आदि समस्त देवताओं के शीश पर सुसज्जित पुष्पों की धूलि (पराग) से धूसरित पाद-पृष्ठवाले सर्पराजों की मालाओं से अलंकृत जटावाले भगवान चन्द्रशेखर हमें चिरकाल तक स्थाई रहनेवाली सम्पदा प्रदान करें.६.
*
करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्ध नञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके |
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचनेरतिर्मम || ७||

धक-धक धधके अग्नि सदा मस्तक में जिनके,
किया पंचशर काम-क्षार बस एक निमिष में.
जो अतिदक्ष नगेश-सुता कुचाग्र-चित्रण में-
प्रीत अटल हो मेरी उन्हीं त्रिलोचन-पद में..७..
*
अपने मस्तक की धक-धक करती जलती हुई प्रचंड ज्वाला से कामदेव को भस्म करनेवाले, पर्वतराजसुता (पार्वती) के स्तन के अग्र भाग पर विविध चित्रकारी करने में अतिप्रवीण त्रिलोचन में मेरी प्रीत अटल हो.७.
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत् - कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः |
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः || ८||

नूतन मेघछटा-परिपूर्ण अमा-तम जैसे,
कृष्णकंठमय गूढ़ देव भगवती उमा के.
चन्द्रकला, सुरसरि, गजचर्म सुशोभित सुंदर-
जगदाधार महेश कृपाकर सुख-संपद दें..८..

नयी मेघ घटाओं से परिपूर्ण अमावस्या की रात्रि के सघन अन्धकार की तरह अति श्यामल कंठवाले, देवनदी गंगा को धारण करनेवाले शिवजी हमें सब प्रकार की संपत्ति दें.८.
*
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकछिदं तमंतकच्छिदं भजे || ९||

पुष्पित नीलकमल की श्यामल छटा समाहित,
नीलकंठ सुंदर धारे कंधे उद्भासित.
गज, अन्धक, त्रिपुरासुर भव-दुःख काल विनाशक-
दक्षयज्ञ-रतिनाथ-ध्वंसकर्ता हों प्रमुदित..

खिले हुए नीलकमल की सुंदर श्याम-प्रभा से विभूषित कंठ की शोभा से उद्भासित कन्धोंवाले, गज, अन्धक, कामदेव तथा त्रिपुरासुर के विनाशक, संसार के दुखों को मिटानेवाले, दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करनेवाले श्री शिवजी का मैं भजन करता हूँ.९.
*
अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदंबमञ्जरी रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणामधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे || १०||

शुभ अविनाशी कला-कली प्रवहित रस-मधुकर,
दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक, भव-दुःख-काम क्षारकर.
गज-अन्धक असुरों के हंता, यम के भी यम-
भजूँ महेश-उमेश हरो बाधा-संकट हर..१०..

नष्ट न होनेवाली, सबका कल्याण करनेवाली, समस्त कलारूपी कलियों से नि:सृत, रस का रसास्वादन करने में भ्रमर रूप, कामदेव को भस्म करनेवाले, त्रिपुर नामक राक्षस का वध करनेवाले, संसार के समस्त दु:खों के हर्ता, प्रजापति दक्ष के यज्ञ का ध्वंस करनेवाले, गजासुर व अंधकासुर को मारनेवाले,, यमराज के भी यमराज शिवजी का मैं भजन करता हूँ.१०.
*
जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः || ११||

वेगवान विकराल विषधरों की फुफकारें,
दह्काएं गरलाग्नि भाल में जब हुंकारें.
डिम-डिम डिम-डिम ध्वनि मृदंग की, सुन मनमोहक.
मस्त सुशोभित तांडवरत शिवजी उपकारें..११..

अत्यंत वेगपूर्वक भ्रमण करते हुए सर्पों के फुफकार छोड़ने से ललाट में बढ़ी हुई प्रचंड अग्निवाले, मृदंग की मंगलमय डिम-डिम ध्वनि के उच्च आरोह-अवरोह से तांडव नृत्य में तल्लीन होनेवाले शिवजी सब प्रकार से सुशोभित हो रहे हैं.११.
*
दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहत || १२||

कड़ी-कठोर शिला या कोमलतम शैया को,
मृदा-रत्न या सर्प-मोतियों की माला को.
शत्रु-मित्र, तृण-नीरजनयना, नर-नरेश को-
मान समान भजूँगा कब त्रिपुरारि-उमा को..१२..

कड़े पत्थर और कोमल विचित्र शैया, सर्प और मोतियों की माला, मिट्टी के ढेलों और बहुमूल्य रत्नों, शत्रु और मित्र, तिनके और कमललोचनी सुंदरियों, प्रजा और महाराजाधिराजों के प्रति समान दृष्टि रखते हुए कब मैं सदाशिव का भजन करूँगा?
*
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरस्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् || १३||

कुञ्ज-कछारों में गंगा सम निर्मल मन हो,
सिर पर अंजलि धारणकर कब भक्तिलीन हो?
चंचलनयना ललनाओं में परमसुंदरी,
उमा-भाल-अंकित शिव-मन्त्र गुंजाऊँ सुखी हो?१३..

मैं कब गंगाजी कछार-कुंजों में निवास करता हुआ, निष्कपट होकर सिर पर अंजलि धारण किये हुए, चंचल नेत्रोंवाली ललनाओं में परमसुंदरी पार्वती जी के मस्तक पर अंकित शिवमन्त्र का उच्चारण करते हुए अक्षय सुख प्राप्त करूँगा.१३.
*
निलिम्पनाथनागरी कदंबमौलिमल्लिका, निगुम्फ़ निर्भरक्षन्म धूष्णीका मनोहरः.
तनोतु नो मनोमुदं, विनोदिनीं महर्नीशं, परश्रियं परं पदं तदंगजत्विषां चय:|| १४||

सुरबाला-सिर-गुंथे पुष्पहारों से झड़ते,
परिमलमय पराग-कण से शिव-अंग महकते.
शोभाधाम, मनोहर, परमानन्दप्रदाता,
शिवदर्शनकर सफल साधन सुमन महकते..१४..

देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते सुगंधमय पराग से मनोहर परम शोभा के धाम श्री शिवजी के अंगों की सुंदरताएँ परमानन्दयुक्त हमारे मनकी प्रसन्नता को सर्वदा बढ़ाती रहें.१४.

प्रचंडवाडवानल प्रभाशुभप्रचारिणी, महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूतजल्पना.
विमुक्तवामलोचनों विवाहकालिकध्वनि:, शिवेतिमन्त्रभूषणों जगज्जयाम जायतां|| १५||

पापभस्मकारी प्रचंड बडवानल शुभदा,
अष्टसिद्धि अणिमादिक मंगलमयी नर्मदा.
शिव-विवाह-बेला में सुरबाला-गुंजारित,
परमश्रेष्ठ शिवमंत्र पाठ ध्वनि भव-भयहर्ता..१५..

प्रचंड बड़वानल की भाँति पापकर्मों को भस्मकर कल्याणकारी आभा बिखेरनेवाली शक्ति (नारी) स्वरूपिणी अणिमादिक अष्ट महासिद्धियों तथा चंचल नेत्रोंवाली देवकन्याओं द्वारा शिव-विवाह के समय की गयी परमश्रेष्ठ शिवमंत्र से पूरित, मंगलध्वनि सांसारिक दुखों को नष्टकर विजयी हो.१५.
*

इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् || १६||

शिवतांडवस्तोत्र उत्तमोत्तम फलदायक,
मुक्तकंठ से पाठ करें नित प्रति जो गायक.
हो सन्ततिमय भक्ति अखंड रखेंहरि-गुरु में.
गति न दूसरी, शिव-गुणगान करे सब लायक..१६..

इस सर्वोत्तम शिवतांडव स्तोत्र का नित्य प्रति मुक्त कंठ से पाठ करने से भरपूर सन्तति-सुख, हरि एवं गुरु के प्रति भक्ति अविचल रहती है, दूसरी गति नहीं होती तथा हमेशा शिव जी की शरण प्राप्त होती है.१६.
*
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः || १७||

करें प्रदोषकाल में शिव-पूजन रह अविचल,
पढ़ दशमुखकृत शिवतांडवस्तोत्र यह अविकल.
रमा रमी रह दे समृद्धि, धन, वाहन, परिचर.
करें कृपा शिव-शिवा 'सलिल'-साधना सफलकर..१७..

परम पावन, भूत भवन भगवन सदाशिव के पूजन के नत में रावण द्वारा रचित इस शिवतांडव स्तोत्र का प्रदोष काल में पाठ (गायन) करने से शिवजी की कृपा से रथ, गज, वाहन, अश्व आदि से संपन्न होकर लक्ष्मी सदा स्थिर रहती है.१७.

|| इतिश्री रावण विरचितं शिवतांडवस्तोत्रं सम्पूर्णं||

|| रावणलिखित(सलिलपद्यानुवादित)शिवतांडवस्तोत्र संपूर्ण||

*****************
Shiva Tandava Stotram (शिवताण्डवस्तोत्रम्) 


Shiva Tandava Stotram is a hymn of praise in the Hindu tradition that describes Shiva's power and beauty. It was sung by the son of Rishi Vishrawas (aka Vishrava), Ravana whose brother is Kubera. Both the fourth and fifth quatrains of this hymn conclude with lists of Shiva's epithets as destroyer, even the destroyer of death itself. Alliteration and onomatopoeia create roiling waves of resounding beauty in this example of Hindu devotional poetry.

In the final quatrain of the poem, after tiring of rampaging across the Earth, Ravana asks, "When will I be happy?" Because of the intensity of his prayers and ascetic meditation, of which this hymn was an example, Ravana received from Shiva the boon of indestructibility by all powers on heaven and earth — except by a human being. Disdaining the seeming weakness of humans, Ravana abducted the wife of Rama, Lord Vishnu incarnate. India's great epic, the Ramayana, tells the story of this abduction and of the battle between Lord Rama and Ravana which shook the universe.

The stotra is in the Aryageeti (आर्यागीति) style, a variant of the Arya (आर्य) style. There are 32 syllables per half shloka.

Shiva Tandava Mantra is a great prayer of Dancing Shiva and those who reads Siva Tandav Stotra at the end of every worship or, reads it after worship of Lord Shiva on the Pradosha day, will get by the blessing of Lord Shiva, and the affectionate sight of god of wealth.


Shiva Tandava Stotram


Jatatavee galajjala pravaha pavitasthale,
Gale avalabhya lambithaam bhujanga tunga malikaam,
Damaddamaddama ddama ninnadava damarvayam,
Chakara chanda tandavam tanotu na shivh shivam. 1

That Shiva, Who have long-garlands of the snake king (cobra) at the neck which is purified by the flow of trickling water-drops in the forest-like twisted hair-locks, Who danced the fierce Tāṇḍava-dance to the music of a sounding-drum, — may bless us.[1]


Jata kataha sambhramabhramanillimpa nirjari,
Vilola veechi vallari viraja mana moordhani,
Dhaga dhaga dhaga jjwala lalata patta pavake,
Kishora Chandra shekare ratih prati kshanam mama. 2

At every moment, may I find pleasure in Shiva, Whose head is situated in between the creeper-like unsteady waves of Nilimpanirjharī (Gańgā), in whose head unsteadily fire (energy) is fuming the like twisted hair-locks, Who has crackling and blazing fire at the surface of forehead, and Who has a crescent-moon (young moon) at the forehead.[2]


Dhara dharendra nandini vilasa bhandhu bhandura,
Sphuradriganta santati pramoda mana manase,
Kripa kataksha dhorani niruddha durdharapadi,
Kwachi digambare mano vinodametu vastuni. 3

May my mind seeks happiness in Shiva, Whose mind has the shining universe and all the living-beings inside, Who is the charming sportive-friend of the daughter of the mountain-king of the Earth ( Himālaya's daughter parvati), Whose uninterrupted series of merciful-glances conceals immense-troubles, and Who has direction as His clothes.[3]


Jata bhujanga pingala sphurat phana mani prabha,
Kadamba kumkuma drava pralipta digwadhu mukhe,
Madhandha sindhura sphuratwagu uttariyamedure,
Manovinodamadbhutam bibhartu bhoota bhartari. 4

May my mind hold in Shiva, by Whom — with the light from the jewels of the shining-hoods of creeper-like yellow-snakes — the face of Dikkanyās’ are smeared with Kadamba-juice like red Kuńkuma, Who looks dense due to the glittering skin-garment of an intoxicated elephant, and Who is the Lord of the ghosts.[4]


Lalata chatwara jwaladdhanam jaya sphulingaya,
Nipeeta pancha sayakam namannilimpanayakam,
Sudha mayookha lekhaya virajamana shekharam,
Maha kapali sampade, sirijjatalamastunah. 5

For a long time, may Shiva — Whose foot-basement is grey due to the series of pollen dust from flowers at the head of Indra (Sahasralocana) and all other demi-gods, Whose matted hairlocks are tied by a garland of the king of snakes, and Who has a head-jewel of the friend of cakora bird — produce prosperity.[5]


Sahastralochana prabhrityashesha lekha shekhara,
Prasoona dhooli dhorani vidhu saranghripeethabhuh,
Bhujangaraja Malaya nibaddha jaata jootakah,
Shriyai chiraya jayatam chakora bandhu shekharah. 6

May we acquire the possession of tress-locks of shiva, Which absorbed the five-arrows (of Kaamadeva) in the sparks of the blazing fire stored in the rectangular-forehead, Which are being bowed by the leader of supernatural-beings, Which have an enticing-forehead with a beautiful streak of crescent-moon.[6]



Karala bhala pattika dhagaddhadhagaddha gajjwala,
Ddhananjayahuti kruta prachanda panchasayake ,
Dharadharendra nandini kuchagra chithrapathraka,
Prakalpanaikashilpini, trilochane ratirmama. 7

May I find pleasure in Trilocana, Who offered the five great-arrows (of Kāmadeva) to the blazing and chattering fire of the plate-like forehead, and Who is the sole-artist placing variegated artistic lines on the breasts of the daughter of Himālaya (Pārvatī).[7]


Naveena megha mandali niruddha durdharatsphurat,
Kuhuh nisheethineetamah prabhandha baddha kandharah,
Nilimpa nirjhari dharastanotu krutti sundarah,
Kalanidhana bandhurah shriyam jagat durandharah. 8

May Shiva — Whose cord-tied neck is dark like a night with shining-moon obstructed by a group of harsh and new clouds, Who holds the River Gańgā, Whose cloth is made of elephant-skin, Who has a curved and crescent moon placed at the forehead, and Who bears the universe — expand [my] wealth.[8]


Prafulla neela pankaja prapancha kalimaprabha,
Valambi kantha kandali ruchi prabandha kandharam,
Smarchchhidam purachchhidam bhavachchhidam makhachchhidam,
Gajachchhidandha kachchhidam tamant kachchhidam bhaje. 9

I adore Shiva, Who supports the dark glow of blooming blue lotus series at around the girdle of His neck, Who cuts-off Smara (Kāmadeva), Who cuts-off Pura, Who cuts-off the mundane existence, Who cuts-off the sacrifice (of Dakṣa), Who cuts-off the demon Gaja, Who cuts-off Andhaka, and Who cuts-off Yama (death).[9]


Akharva sarva mangalaa kalaa kadamba manjari,
Rasa pravaha madhuri vijrumbhane madhuvritam,
Smrantakam, purantakam, bhavantakam, makhantakam,
Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje. 10

I adore Shiva, Who only eats the sweet-flow of nectar from the beautiful flowers of Kadamba-trees which are the abode of all important auspicious qualities, Who destroys Smara (Kāmadeva), Who destroys Pura, Who destroys the mundane existence, Who destroys the sacrifice (of Dakṣa), Who destroys the demon Gaja, Who destroys Andhaka, and Who destroys Yama (death).[10]


Jayatwadabhra vibhrama bhramadbujanga mashwasad,
Vinirgamat, kramasphurat, karala bhala havya vaat,
Dhimiddhimiddhimi maddhwanan mridanga tunga mangala,
Dhwani krama pravartitah prachanda tandawah shivah. 11


May Shiva, Whose dreadful forehead has oblations of plentiful, turbulent and wandering snake-hisses — first coming out and then sparking, Whose fierce tāṇḍava-dance is set in motion by the sound-series of the auspicious and best-drum (ḍamaru) — which is sounding with ‘dhimit-dhimit’ sounds, be victorious.[11]


Drushadwichitra talpayor bhujanga mauktikastrajor,
Garishtha ratna loshtayoh suhrid wipaksha pakshayoh,
Trinara vinda chakshushoh praja mahee mahendrayoh,
Samapravrittikah katha sadashivam bhajamyaham. 12

When will I adore SadāShiva with an equal vision towards varied ways of the world, a snake or a pearl-garland, royal-gems or a lump of dirt, friend or enemy sides, a grass-eyed or a lotus-eyed person, and common men or the king.[12]


Kada nilimpa nirjharee nikunja kotare vasan,
Vimukta durmatih sada shirahstha manjali vahan,
Vilola lola lochane lalama bhala lagnakah,
Shiveti mantra muchcharan kada sukhee bhavamyaham. 13

Living in the hollow of a tree in the thickets of River Gańgā, always free from ill-thinking, bearing añjali at the forehead, free from lustful eyes, and forehead and head bonded, when will I become content while reciting the mantra ‘‘Shiva?’’[13]


Nilimpnath naagaree kadamb mauli mallika,
nigumpha nirbharkshanm dhooshnika manoharah.
tanotu no manomudam vinodineem maharshinam,
parshriyam param padam tadanjatvisham chayah.14

Divine beauty of different parts of Lord Shiv which are enlighted by fragrence of the flowers decorating the twisted hairlocks of angles may always bless us with happiness and pleasure.[14]


prachanda wadavaanal prabha shubh pracharinee,
mahaasht siddhi kaaminee janavahoot jalpana.
vimukta vaam lochano vivaah kaalikdhvanih,
shiveti mantra bhooshano jagajjayaay jaaytaam.15

The Shakti (energy) which is capable of burning all the sins and spreading welfare of all and the pleasent sound produced by angles during enchanting the pious Shiv mantra at the time of Shiv-Parvati Vivah may winover & destroy all the sufferings of the world.[15]


Imam hi nitya meva mukta muttamottamstavam,
Pathantaram bhunannaro vishuddhmeti santatam,
Hare Gurau sa bhaktimashu yati nanyatha gati,
Vimohanam hi dehinaa tu shankarasya chitanam. 16

Reading, remembering, and reciting this eternal, having spoken thus, and the best among best eulogy indeed incessantly leads to purity. In preceptor Hara (Śhiva) immediately the state of complete devotion is achieved; no other option is there. Just the thought of Śhiva (Śhańkara) is enough for the people.[16]


Poojavasana samaye dasha vaktra geetam,
Yah shambhu poojana param pathati pradoshe,
Tasyasthiraam ratha gajendra turanga yuktaam,
Lakshmeem sadaiva sumukheem pradadaati shambuh. 17

At the time of prayer-completion, that who reads this song by Daśavaktra (Rāvaṇa) after the prayer of Śambhu — Śambhu gives him stable wealth including chariots, elephants and horses, and beautiful face.[17]


Iti Shree Ravanavirachitam, Shiva tandava stotram, Sampoornam.

**************


                               शिव महिम्न स्तोत्र का उनीसवां श्लोक

हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयोर्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम|   
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषारयाणां रक्षायै त्रिपुरहर! जागर्ति जगताम|१९|
भावानुवाद
शिव-पूजन हित विराजे, हरि ले कमल हजार
एक कमल हरकर रहे, हर चुप दृश्य निहार
नटवर दुविधा-व्यथित हर-कौतुक से अनजान
नयनकमल अर्पण करूँ, मन ही मनमें ठान 
जैसे ही तत्पर हुए, प्रगटे शिव त्रिपुरारि 
रक्षा की दे सुदर्शन चक्र- विव्हल गिरधारि 
*****