menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

शनिवार, 14 जून 2014

dohanjali: sanjiv

पितृ दिवस पर- 
पिता सूर्य सम प्रकाशक :
संजीव 
* 
पिता सूर्य सम प्रकाशक, जगा कहें कर कर्म 
कर्म-धर्म से महत्तम, अन्य न कोई मर्म  
*
गृहस्वामी मार्तण्ड हैं, पिता जानिए सत्य 
सुखकर्ता भर्ता पिता, रवि श्रीमान अनित्य 
*
भास्कर-शशि माता-पिता, तारे हैं संतान 
भू अम्बर गृह मेघ सम, दिक् दीवार समान 
*
आपद-विपदा तम हरें, पिता चक्षु दें खोल 
हाथ थाम कंधे बिठा, दिखा रहे भूगोल 
*
विवस्वान सम जनक भी, हैं प्रकाश का रूप 
हैं विदेह मन-प्राण का, सम्बल देव अनूप 
*
छाया थे पितु ताप में, और शीत में ताप
छाता बारिश में रहे, हारकर हर संताप 
*
बीज नाम कुल तन दिया, तुमने मुझको तात
अन्धकार की कोख से, लाकर दिया प्रभात 
*
गोदी आँचल लोरियाँ, उँगली कंधा बाँह 
माँ-पापा जब तक रहे, रही शीश पर छाँह 
*
शुभाशीष से भरा था, जब तक जीवन पात्र 
जान न पाया रिक्तता, अब हूँ याचक मात्र
*
पितृ-चरण स्पर्श बिन, कैसे हो त्यौहार 
चित्र देख मन विकल हो, करता हाहाकार 
*
तन-मन की दृढ़ता अतुल, खुद से बेपरवाह 
सबकी चिंता-पीर हर, ढाढ़स दिया अथाह 
*
श्वास पिता की धरोहर, माँ की थाती आस
हास बंधु, तिय लास है, सुता-पुत्र मृदु हास 
*   

बुधवार, 11 जून 2014

chhand salila: vidhata chhand -sanjiv

छंद सलिला:
विधाता/शुद्धगाRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण:  जाति यौगिक, प्रति पद २८ मात्रा, 
                   यति ७-७-७-७ / १४-१४ , ८ वीं - १५ वीं मात्रा लघु 
विशेष: उर्दू बहर हज़ज सालिम 'मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन मुफाईलुन' इसी छंद पर आधारित है. 

लक्षण छंद:

    विधाता को / नमन कर ले , प्रयासों को / गगन कर ले 
    रंग नभ पर / सिंधु में जल , साज पर सुर / अचल कर ले 
    सिद्धि-तिथि लघु / नहीं कोई , दिखा कंकर / मिला शंकर  
    न रुक, चल गिर / न डर, उठ बढ़ , सीकरों को / सलिल कर ले        
    संकेत: रंग =७, सिंधु = ७, सुर/स्वर = ७, अचल/पर्वत = ७ 
               सिद्धि = ८, तिथि = १५ 
उदाहरण:

१.  न बोलें हम न बोलो तुम , सुनें कैसे बात मन की?       
    न तोलें हम न तोलो तुम , गुनें कैसे जात तन की ?  
    न डोलें हम न डोलो तुम , मिलें कैसे श्वास-वन में?   
    न घोलें हम न घोलो तुम, जियें कैसे प्रेम धुन में? 
     जात = असलियत, पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात 

२. ज़माने की निगाहों से , न कोई बच सका अब तक
   निगाहों ने कहा अपना , दिखा सपना लिया ठग तक     
   गिले - शिकवे करें किससे? , कहें किसको पराया हम?         
   न कोई है यहाँ अपना , रहें जिससे नुमायाँ हम  

३. है हक़ीक़त कुछ न अपना , खुदा की है ज़िंदगानी          
    बुन रहा तू हसीं सपना , बुजुर्गों की निगहबानी
    सीखता जब तक न तपना , सफलता क्यों हाथ आनी?  
    कोशिशों में खपा खुदको , तब बने तेरी कहानी

४. जिएंगे हम, मरेंगे हम, नहीं है गम, न सोचो तुम 
    जलेंगे हम, बुझेंगे हम, नहीं है तम, न सोचो तुम 
    कहीं हैं हम, कहीं हो तुम, कहीं हैं गम, न सोचो तुम 
    यहीं हैं हम, यहीं हो तुम, नहीं हमदम, न सोचो तुम 
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विधाता, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शुद्धगा, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

chhand salila;

छंद सलिला:
विष्णुपदRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण:  जाति महाभागवत, प्रति पद २६ मात्रा, 
                   यति१६-१०, पदांत गुरु 

लक्षण छंद:

    सोलह गुण आगार विष्णुपद , दस दिश बसें रमा
    अवढरदानी प्रभु प्रसन्न हों , दें आशीष उमा 
    गुरु पदांत शोभित हो गुरुवत , सुमधुर बंद रचें 
    भाव बिम्ब लय अलंकार रस , सस्वर छंद नचें       
    
उदाहरण:

१. भारत माता की जय बोलो , ध्वज रखो ऊँचा
   कोई काम न ऐसा करना , शीश झुके नीचा    
   जगवाणी हिंदी की जय हो , सुरवाणी बोलो        
   हर भाषा है शारद मैया , कह मिसरी घोलो 

२. सारी दुनिया है कुटुंबवत , दूर करो दूरी            
    भाषा-भूषा धर्म-क्षेत्र की , क्यों हो मजबूरी?
    दिल का दिल से नेता जोड़ो , भाईचारा हो 
    सांझी थाती रहे विरासत , क्यों बँटवारा हो?     

३. जो हिंसा फैलाते उनको , भारी दंड मिलें        
    नारी-गौरव के अपराधी , जीवित नहीं बचें 
    ममता समता सदाचार के , पग-पग कमल खिलें   
    रिश्वत लालच मोह लोभ अब, किंचित नहीं पचें 
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, विष्णुपद, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

मंगलवार, 10 जून 2014

chhand salila: anugeet chhand -sanjiv

छंद सलिला:
अनुगीतRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण:  जाति महाभागवत, प्रति पद २६ मात्रा, 
                   यति१६-१०, पदांत लघु 

लक्षण छंद:

    अनुगीत सोलह-दस कलाएँ , अंत लघु स्वीकार
    बिम्ब रस लय भाव गति-यतिमय , नित रचें साभार     
    
उदाहरण:

१. आओ! मैं-तुम नीर-क्षीरवत , एक बनें मिलकर
   देश-राह से शूल हटाकर , फूल रखें चुनकर     
   आतंकी दुश्मन भारत के , जा न सकें बचकर      
   गढ़ पायें समरस समाज हम , रीति नयी रचकर    

२. धर्म-अधर्म जान लें पहलें , कर्तव्य करें तब            
    वर्तमान को हँस स्वीकारें , ध्यान धरें कल कल
    किलकिल की धारा मोड़ें हम , धार बहे कलकल 
    कलरव गूँजे दसों दिशा में , हरा रहे जंगल    

३. यातायात देखकर चलिए , हो न कहीं टक्कर          
    जान बचायें औरों की , खुद आप रहें बचकर  
    दुर्घटना त्रासद होती है , सहें धीर धरकर  
    पीर-दर्द-दुःख मुक्त रहें सब , जीवन हो सुखकर
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अनुगीत, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

सोमवार, 9 जून 2014

chhand salila: kamroop chhand -sanjiv

छंद सलिला:
कामरूपRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद मात्रा २६, यति ९-७-१०, पदांत गुरु लघु 

लक्षण छंद:

    कामरूप छंद , दे आनंद , सँग खुशियां अनंत
    मुँहदेखा नहीं , सच हमेशा , खरा कहे ज्यों संत   
    नौ निधि सात सुर , दस दिशाएँ , करें सुकीर्ति गान 
    अंत में अंतर , भुला लघु-गुरु , लगे सदा समान    
      
उदाहरण:

१. गले लग जाओ , प्रिये! आओ , करो पूरी चाह
   गीत मिल गाओ , प्रिये! आओ , मिटे सारी दाह  
   दूरियाँ कम कर , मुस्कुराओ , छिप भरो मत आह    
   मन मिले मन से , खिलखिलाओ , करें मिलकर वाह  

२. चलें विद्यालय , पढ़ें-लिख-सुन , गुनें रहकर साथ          
    करें जुटकर श्रम , रखें ऊँचा , हमेशा निज माथ
    रोप पौधे कुछ , सींच हर दिन , दें धरा को हास
    प्रदूषण हो कम , हँसे जीवन / कर सदैव प्रयास 

३. ईमान की हो , फिर प्रतिष्ठा , प्रयासों की जीत
    दुश्मनों की हो , पराजय ही / विजय पायें मीत
    आतंक हो अब , खत्म नारी , पा सके सम्मान
    मुनाफाखोरी ,  न रिश्वत हो , जी सके इंसान

४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
    है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
    है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
    है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध   
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

chhand salila: jhulna chhand -sanjiv

छंद सलिला:
झूलनाRoseछंद 

संजीव
*
छंद लक्षण:  जाति महाभागवत, प्रति पद २६ मात्रा, 
                   यति ७-७-७-५, पदांत गुरु लघु 

लक्षण छंद:

    हरि! झूलना , मत भूलना , राधा कहें , हँस झूम
    घन श्याम को , झट दामिनी , ने लिया कर , भर चूम    
    वेणु सुर ऋषि , वचन सुनने , लास-रास क/रें मौन 
    कौन किसका , कब हुआ है? , बोल सकता / रे! कौन?   
      
उदाहरण:

१. मैं-तुम मिले , खो, गुम हुए , फिर हम बने , इकजान
   पद-पथ मिले , मंज़िल हुए , हमदम हुए , अनजान   
   गेसू खुले , टेसू खिले , सपने हुए , साकार     
   पलकें खुलीं , अँखियाँ मिलीं , अपने हुए , दिलदार   

२. पथ पर चलें , गिर-उठ बढ़ें , नभ को छुएँ , मिल साथ           
    प्रभु! प्रार्थना , आशीष दें , ऊँचा उठा , हो माथ
    खुद से न आँ/खें चुराने , की घड़ी आ/ये तात!
    हौसलों की , फैसलों से , मत हो सके , रे मात   

३. देश-गौरव , से नहीं है , अधिक गौरव , सच मान        
    देश हित मर-मर अमर हों , नित्य शहीद, हठ ठान 
    है भला या , है बुरा- है , देश अपना , मजबूत 
    संभावना , सच करेंगे , संकल्प है , शुभ-पूत
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामरूप, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शनिवार, 7 जून 2014

rashtreey kayasth mahaparishad sammelan cuttack 6-7-2014

ॐ 
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद 
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओं/सज्जनों का परिसंघ, पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवास, पड़ाव पोखरलेन, आमगोला, मुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३, ०६२१-२२४३९९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा'सलिल', २०४ , विजय अपार्टमेन्ट, नेपियर टाउन, जबलपुर, ४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ , ०७६१ २४१११३१, salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१, ब्लोक ६, मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५, ०६१२ २६८४४४४, arbindsinha@yahoo.com 
।  कायास्थित ईश का, अंश हुआ कायस्थ ।
।। सब सबके सहयोग से, हों उन्नत आत्मस्थ ।।
================
पत्र क्रमांक: ४८५ महा/राकाम/२०१४                   जबलपुर, दिनाँक:​ ७-६-२०१४ 
            राष्ट्रीय कायस्थ महासभा अर्धवार्षिक सम्मेलन : २०१३-१४ : अधिसूचना
. दिनांक: ५-६ जुलाई २०१४,   स्थान:श्री रामचन्द्र भवन, म्युनिसिपैल्टी कॉम्प्लेक्स,कटक।
संयोजक:प्रो. डॉ. नीलमणि दास, उपाध्यक्ष रा.का.म., चलभाष:०९४३७३१३६६७, ई मेल: Nilamani Das
कार्यक्रम विवरण : दिनांक : ५ - ७- २०१४
(अ)  कार्यकारिणी/संगठन समिति समिति बैठक  : अपरान्ह ४.०० बजे से संध्या ६.०० बजे । 
[संविधान कंडिका १२  के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष, संगठन सचिव, संयुक्त संगठन सचिव, मुख्य समन्वयक, संयोजक, प्रकोष्ठ प्रभारी आदि समस्त पदाधिकारी तथा सम्बद्ध संस्था प्रतिनिधि।]
कार्यवाही : सञ्चालन महामंत्री द्वारा, सहायक : संगठन सचिव, कोषाध्यक्ष  
कार्यावलि: १. देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त अर्चना।
२. गत सञ्चालन समिति/संगठन समिति/सामान्य समिति बैठकों के प्रतिवेदनों तथा पदाधिकारियों के लिखित प्रतिवेदनों पर विचार। 
३. आय-व्यय विवरण पारित किया जाना। 
४. बजट प्रस्तावों पर विचार  / अनुशंसा।
५. सञ्चालन समिति बैठक हेतु प्राप्त लिखित प्रतिवेदनों प्रस्तावों/सुझावों/कार्यक्रमों/आमंत्रणों/आवेदनों/सम्मान प्रस्तावों पर विचार व अनुशंसा। आगामी त्रिमास हेतु लक्ष्य निर्धारण।   
६. अन्य विषय अध्यक्ष की अनुमति से। 
७. महामंत्री/अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन व समापन।
संध्या ६ बजे: स्वल्पाहार-चाय।
(आ)  सञ्चालन समिति बैठक  : अपरान्ह ६.३० बजे से रात्रि ८.०० बजे । 
[संविधान कंडिका ९-११ के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महामंत्री, सचिव, संयुक्त सचिव, कोषाध्यक्ष, संगठन सचिव, संयुक्त संगठन सचिव, समन्वयक, कार्यकारी सदस्य] 
 कार्यवाही सञ्चालन महामंत्री द्वारा, सहायक: मुख्यालय सचिव, कार्यालय सचिव, कोषाध्यक्ष      
: कार्यावलि :
१. देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त वंदना ।
२. गत सञ्चालन समिति बैठक के कार्यवाही प्रतिवेदन, सञ्चालन समिति सदस्यों / पदाधिकारियों (संगठन सचिव, कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष,  कार्यालय सचिव, मुख्यालय सचिव आदि) के प्रतिवेदनों, कार्यकारिणी समिति की लिखित अनुशंसाओं, प्राप्त लिखित अवदानों पर विचार व निर्णय ।
३. सामान्य सम्मेलन में पारित कराने हेतु वार्षिक बजट को अन्तिम रूप देना। 
४. पंजीयक को प्रेषित करने हेतु संचालन समिति का अनुमोदन।
५. आगामी सम्मेलनों, बैठकों व प्रतिभा-सम्मान हेतु प्राप्त लिखित प्रस्तावों पर निर्णय। 
६.  सामान्य सभा हेतु प्रतिवेदनों, प्रस्तावों, कार्यक्रमों, प्रमाणपत्रों आदि का अनुमोदन।
७. महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन व समापन।
रात्रि ८ बजे: साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम।       रात्रि ९.३० बजे: अतिथि भोज।
दिनांक : ६ - ७- २०१४
(अ)  प्रातः ८ बजे: स्वल्पाहार, चाय ।
(आ) सामान्य सम्मेलन: प्रातः ९ बजे से ४ बजे 
संविधान कंडिका १२ के अनुसार उपस्थिति प्रार्थनीय : संस्था के समस्त पदाधिकारी व सदस्य, सम्बद्ध संस्थापदाधिकारी/सदस्य, समाज के सभी सदस्य व अन्य समाजों के कायस्थ मित्र.
(क) स्वागत / परिचय सत्र: सञ्चालन सचिव स्वागत समिति द्वारा 
१. ध्वजारोहण तथा देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त पूजन, आरती ।
२. संयोजक द्वारा अतिथि/ पदाधिकारी स्वागत व स्वागत भाषण, आयोजन पर प्रकाश। 
३. अतिथि / राष्ट्रीय पदाधिकारी परिचय । 
४. सम्बद्ध तथा स्थानीय संस्था प्रतिनिधि परिचय। 
५. उपस्थितों द्वारा आत्म परिचय । 
६.  महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन।  
७. अतिथियों का सम्बोधन तथा संयोजक द्वारा आभार।
(ख) कार्यवाही सत्र: सञ्चालन महामंत्री द्वारा
१. महामंत्री द्वारा सत्र प्रक्रिया की जानकारी।
२. महापरिषद का लेखा-जोखा, वार्षिक बजट, नियुक्तियाँ, बैठक प्रतिवेदनों को पारित करना।
३. उपस्थित सदस्यों से प्राप्त लिखित प्रतिवेदनों / सुझावों आदि पर विचार व निर्णय।
३.  स्थानीय संस्थाओं, आयोजनों, समस्याओं पर चर्चा व निर्णय। 
४.  परिचर्चा: '२१ वीं सदी में जातिगत आरक्षण और कायस्थ समाज। 
५.  महामंत्री / अध्यक्ष द्वारा सम्बोधन ।
अपरान्ह १.०० बजे: बिरादरी भोज।
(ग) समापन सत्र: अपरान्ह २.०० बजे: सञ्चालन संयोजक द्वारा
१. अतिथि आमंत्रण।                        २. प्रतिभा पुरस्कार / सम्मान।
३. अतिथियों का सम्बोधन।                ४. अतिथियों द्वारा आयोजकों के प्रति आभार। 
५. संयोजक द्वारा अतिथियों के प्रति आभार व समापन।
​salil.sanjiv@gmail.com                                                                                  ​
​http://divyanarmada.blogspot.in                                               संजीव वर्मा 'सलिल'
​facebook: sahiyta salila / sanjiv verma 'salil'                                       महामंत्री 

शुक्रवार, 6 जून 2014

chhand salila: geeta chhand -sanjiv

छंद सलिला:

गीता Roseछंद 

संजीव
*
छंद-लक्षण: जाति महाभागवत, प्रति पद - मात्रा २६ मात्रा, यति १४ - १२, पदांत गुरु लघु.

लक्षण छंद:

    चौदह भुवन विख्यात है , कुरु क्षेत्र गीता-ज्ञान
    आदित्य बारह मास नित , निष्काम करे विहान  
    अर्जुन सदृश जो करेगा , हरी पर अटल विश्वास  
    गुरु-लघु न व्यापे अंत हो , हरि-हस्त का आभास    
     संकेत: आदित्य = बारह 
उदाहरण:

१. जीवन भवन की नीव है , विश्वास- श्रम दीवार
   दृढ़ छत लगन की डालिये , रख हौसलों का द्वार   
   ख्वाबों की रखें खिड़कियाँ , नव कोशिशों का फर्श   
   सहयोग की हो छपाई , चिर उमंगों का अर्श 

२. अपने वतन में हो रहा , परदेश का आभास         
    अपनी विरासत खो रहे , किंचित नहीं अहसास
    होटल अधिक क्यों भा रहा? , घर से हुई क्यों ऊब?
    सोचिए! बदलाव करिए , सुहाये घर फिर खूब 

३. है क्या नियति के गर्भ में , यह कौन सकता बोल?
    काल पृष्ठों पर लिखा क्या , कब कौन सकता तौल?
    भाग्य में किसके बदा क्या , पढ़ कौन पाया खोल?
    कर नियति की अवमानना , चुप झेल अब भूडोल।

४. है क्षितिज के उस ओर भी , सम्भावना-विस्तार
    है ह्रदय के इस ओर भी , मृदु प्यार लिये बहार
    है मलयजी मलय में भी , बारूद की दुर्गंध
    है प्रलय की पदचाप सी , उठ रोक- बाँट सुगंध   
                         *********  
(अब तक प्रस्तुत छंद: अखण्ड, अग्र, अचल, अचल धृति, अरुण, अवतार, अहीर, आर्द्रा, आल्हा, इंद्रवज्रा, उड़ियाना, उपमान, उपेन्द्रवज्रा, उल्लाला, एकावली, कुकुभ, कज्जल, कामिनीमोहन, काव्य, कीर्ति, कुण्डल, कुडंली, गीता, गीतिका, गंग, घनाक्षरी, चौबोला, चंडिका, चंद्रायण, छवि, जग, जाया, तांडव, तोमर, त्रिलोकी, दिक्पाल, दीप, दीपकी, दोधक, दृढ़पद, नित, निधि, निश्चल, प्लवंगम्, प्रतिभा, प्रदोष, प्रभाती, प्रेमा, बाला, भव, भानु, मंजुतिलका, मदनअवतार, मदनाग, मधुभार, मधुमालती, मनहरण घनाक्षरी, मनमोहन, मनोरम, मानव, माली, माया, माला, मोहन, मृदुगति, योग, ऋद्धि, रसामृत, रसाल, राजीव, राधिका, रामा, रूपमाला, रोला, लीला, वस्तुवदनक, वाणी, विरहणी, विशेषिका, शक्तिपूजा, शशिवदना, शाला, शास्त्र, शिव, शुभगति, शोभन, शंकर, सरस, सार, सारस, सिद्धि, सिंहिका, सुखदा, सुगति, सुजान, सुमित्र, संपदा, हरि, हेमंत, हंसगति, हंसी)

शुक्रवार, 30 मई 2014

lekh: kundli milan men gan vichar sanjiv

लेख: 
कुंडली मिलान में गण-विचार
संजीव 
*








वैवाहिक संबंध की चर्चा होने पर लड़का-लड़की की कुंडली मिलान की परंपरा भारत में है. कुंडली में वर्ण का १, वश्य के २, तारा के ३, योनि के ४, गृह मैटरर के ५, गण के ६, भकूट के ७ तथा नाड़ी के ८ कुल ३६ गुण होते हैं.जितने अधिक गुण मिलें विवाह उतना अधिक सुखद माना जाता है. इसके अतिरिक्त मंगल दोष का भी  विचार किया जाता है. 

कुंडली मिलान में 'गण' के ६ अंक होते हैं. गण से आशय मन:स्थिति या मिजाज (टेम्परामेन्ट) के तालमेल से हैं. गण अनुकूल हो तो दोनों में उत्तम सामंजस्य और समन्वय उत्तम होने तथा गण न मिले तो शेष सब अनुकूल होने पर भी अकारण वैचारिक टकराव और मानसिक क्लेश होने की आशंका की जाती है. दैनंदिन जीवन में छोटी-छोटी बातों में हर समय एक-दूसरे की सहमति लेना या एक-दूसरे से सहमत होना संभव नहीं होता,  दूसरे को सहजता से न ले सके और टकराव हो तो पूरे परिवार की मानसिक शांति नष्ट होती है। गण भावी पति-पत्नी के वैचारिक साम्य और सहिष्णुता को इंगित करते हैं। 

ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थ कल्पद्रुम के अनुसार निम्न २ स्थितियों में गण दोष को महत्त्वहीन कहा गया है:

१. 'रक्षो गणः पुमान स्याचेत्कान्या भवन्ति मानवी । केपिछान्ति तदोद्वाहम व्यस्तम कोपोह नेछति ।।' 

अर्थात जब जातक का कृतिका, रोहिणी, स्वाति, मघा, उत्तराफाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढा नक्षत्रों में जन्म हुआ हो।

        २. 'कृतिका रोहिणी स्वामी मघा चोत्त्राफल्गुनी । पूर्वाषाढेत्तराषाढे न क्वचिद गुण दोषः ।।'

अर्थात जब वर-कन्या के राशि स्वामियों अथवा नवांश के स्वामियों में मैत्री हो।

      गण को ३ वर्गों 1-देवगण, 2-नर गण, 3-राक्षस गण में बाँटा गया है। गण मिलान ३ स्थितियाँ हो सकती हैं:

1. वर-कन्या दोनों समान गण के हों तो सामंजस्य व समन्वय उत्तम होता है. 

2. वर-कन्या देव-नर हों तो सामंजस्य संतोषप्रद होता है ।

३. वर-कन्या देव-राक्षस हो तो सामंजस्य न्यून होने के कारण पारस्परिक टकराव होता है ।

शारंगीय के अनुसार; वर राक्षस गण का और कन्या मनुष्य गण की हो तो विवाह उचित होगा। इसके विपरीत वर मनुष्य गण का एवं कन्या राक्षस गण की हो तो विवाह उचित नहीं अर्थात सामंजस्य नहीं होगा। 

सर्व विदित है कि देव सद्गुणी किन्तु विलासी, नर या मानव परिश्रमी तथा संयमी एवं असुर या राक्षस दुर्गुणी, क्रोधी तथा अपनी इच्छा अन्यों पर थोपनेवाले होते हैं।  

भारत में सामान्यतः पुरुषप्रधान परिवार हैं अर्थात पत्नी सामान्यतः पति की अनुगामिनी होती है। युवा अपनी पसंद से विवाह करें या अभिभावक तय करें दोनों स्थितियों में वर-वधु के जीवन के सभी पहलू एक दूसरे को विदित नहीं हो पाते। गण मिलान अज्ञात पहलुओं का संकेत कर सकता है। गण को कब-कितना महत्त्व देना है यह उक्त दोनों तथ्यों तथा वर-वधु के स्वभाव, गुणों, शैक्षिक-सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में विचारकर तय करना चाहिए। 

गुरुवार, 29 मई 2014

haiku: sanjiv

हाइकु सलिला: 

संजीव 
*
कमल खिला
संसद मंदिर में
पंजे को गिला   
*
हट गयी है 
संसद से कैक्टस
तुलसी लगी
* 
नरेंद्र नाम 
गूँजा था, गूँज रहा 
अमरीका में 
*
मिटा कहानी 
माँ और बेटे लिखें 
नयी कहानी 
 * 
नहीं हैं साथ 
वर्षों से पति-पत्नी 
फिर भी साथ 
*